भ्रष्टाचार की सीपेज,जिला चिकित्सालय का ट्रॉमा ICU बना तालाब, टपकती छत के नीचे वेंटिलेटर खिसकाकर बचाई गई मरीजों की जान
Junaid Khan - शहडोल। सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का फासला देखना हो, तो जिला चिकित्सालय के ट्रॉमा आईसीयू (ICU) वॉर्ड का रुख कर लीजिए। यहाँ मरीजों को बीमारियों से बचाने के लिए नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही के कारण पैदा हुए हादसों से बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। रविवार शाम ठीक ५ बजे जिला चिकित्सालय के सबसे संवेदनशील हिस्से यानी ट्रॉमा आईसीयू में उस समय अचानक अफरा-तफरी और चीख-पुकार का माहौल बन गया,जब छत से सीधे मरीजों के बेड पर पानी का सैलाब टपकने लगा। जिन मरीजों को मुकम्मल इलाज और शांति की जरूरत थी, वे और उनके तीमारदार अपनी जान बचाने के लिए बदहवास भागते नजर आए। आनन-फानन में वेंटिलेटर और पलंगों को अपनी जगह से खिसकाया गया, तब कहीं जाकर गंभीर रूप से भर्ती मरीजों की सांसें सुरक्षित रह सकीं।
निर्माण के नाम पर अवैध खेल और भारी लापरवाही
इस पूरे शर्मनाक घटनाक्रम के पीछे की मुख्य वजह अस्पताल की छत के ऊपर चल रहा लैब निर्माण का कार्य बताया जा रहा है। सूत्रों की मानें तो इस निर्माण कार्य के दौरान भारी लापरवाही बरती गई और पानी की मुख्य पाइप लाइन को बुरी तरह तोड़ दिया गया। पाइप लाइन टूटने के बाद पानी को रोकने या डाइवर्ट करने के बजाय, उसे बेतरतीब तरीके से बहने दिया गया, जिससे पूरी छत पर पानी जमा हो गया। पानी का भराव इतना अधिक था कि वह चंद मिनटों में सीपेज (रीसाव) होकर सीधे नीचे स्थित आईसीयू कमरे में गिरने लगा। देखते ही देखते वॉर्ड का फर्श पानी से लबालब हो गया और पूरा आईसीयू कमरा किसी तालाब में तब्दील हो गया। गंभीर रूप से बीमार मरीजों के ऊपर सीधे गंदा पानी गिर रहा था, जो संक्रमण और बड़े हादसे (जैसे शॉर्ट सर्किट) को खुली दावत दे रहा था।
प्रशासनिक लीपापोती,सुधरे हालात या सिर्फ कागजी खानापूर्ति?
घटना के काफी देर बाद जागे अस्पताल प्रबंधन और कर्मचारियों ने मौके पर पहुंचकर कमरे में भरे पानी को बाहर निकालने का काम शुरू किया। इस गंभीर विफलता और मरीजों की जान जोखिम में डालने के मामले पर जब जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगा गया, तो सिविल सर्जन डॉ. शिल्पी सराफ ने हमेशा की तरह एक रटा-रटाया प्रशासनिक बयान जारी कर दिया। उनका कहना है कि कर्मचारियों ने तत्काल मौके पर पहुंचकर स्थिति को संभाल लिया है और सुधार कार्य कर दिया गया है। छत में सीपेज का सही कारण और तकनीकी खामी का पता लगाने के लिए एनएचएम (NHM) के इंजीनियर को निर्देशित किया गया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब करोड़ों रुपए का बजट इस अस्पताल के रखरखाव पर खर्च होता है, तो ऐसी नौबत ही क्यों आई कि मरीजों को वेंटिलेटर खिसकाने पड़े? क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा था?
अखबार की पैनी नजर का असर,अब जनता मांग रही जवाब
अस्पताल प्रबंधन चाहे जितनी लीपापोती कर ले, लेकिन इस गंभीर अव्यवस्था और भ्रष्टाचार की बू आ रहे इस निर्माण कार्य पर अब चौतरफा सवाल उठने लगे हैं। पूर्व में भी चिकित्सालय की व्यवस्थाओं को लेकर लगातार आवाज उठाई जाती रही है, और इस खबर के सामने आने के बाद अब प्रशासन की नींद उड़ी हुई है। अस्पताल के भीतर चल रहे इस कथित विकास कार्य और उसके पीछे की 'अवैध' व लापरवाह कार्यप्रणाली को लेकर अब जनता सीधे तौर पर जवाबदेह अधिकारियों को कटघरे में खड़ा कर रही है। जब सबसे सुरक्षित माने जाने वाले आईसीयू वॉर्ड का यह आलम है, तो सामान्य वॉर्डों में मरीजों की सुरक्षा भगवान भरोसे ही समझी जानी चाहिए।
सुलगते सवाल,कौन लेगा इस जानलेवा लापरवाही की जिम्मेदारी
यह महज एक तकनीकी खराबी या पाइप लाइन का टूटना नहीं है, बल्कि यह सीधे-सीधे मानव जीवन के साथ खिलवाड़ का संगीन मामला है। गंभीर रूप से बीमार मरीज जो वेंटिलेटर के सहारे जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं, उन्हें इस तरह बेसहारा छोड़ देना प्रशासनिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। लैब निर्माण कर रही एजेंसी,वहां मौजूद ठेकेदार और उनकी निगरानी करने वाले लोक निर्माण विभाग या एनएचएम के तकनीकी अधिकारियों ने इस कार्य की सुरक्षा ऑडिट क्यों नहीं की? क्या इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच होगी या फिर हर बार की तरह छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराकर असली मगरमच्छों को अभयदान दे दिया जाएगा? जिला प्रशासन को अब इस पर सख्त कदम उठाना ही होगा।
