बिना कार्ड दिए वसूले जा रहे करोड़ों रुपए; आखिर किसकी शह पर फल-फूल रहा है बिचौलियों का 'समानांतर प्रशासन'?
Junaid Khan - शहडोल। जिले के परिवहन विभाग में इन दिनों 'अंधेर नगरी, चौपट राजा' वाली स्थिति बनी हुई है। स्मार्ट कार्ड के नाम पर वाहन चालकों से अवैध वसूली का एक ऐसा खेल चल रहा है, जिसने सरकारी सिस्टम की साख को धुल चटा दी है। ड्राइविंग लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (RC) के नाम पर जनता से 'डबल पेमेंट' वसूली जा रही है, लेकिन बदले में उन्हें मिल रही है तो सिर्फ रसीदें और तारीखें।
200 रुपये का 'प्लास्टिक शुल्क' और महीनों का इंतजार
परिवहन विभाग की लापरवाही का आलम यह है कि हर आवेदक से 200 रुपये का 'स्मार्ट कार्ड शुल्क' नियम के नाम पर तुरंत वसूल लिया जाता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि पैसे देने के हफ्तों और महीनों बाद भी आवेदकों को कार्ड नसीब नहीं हो रहे। सरकारी खजाने में फीस जमा होने के बावजूद वाहन चालक सड़कों पर चेकिंग के दौरान रसीदें लहराने को मजबूर हैं।
बिचौलियों की चांदी: RTO के इर्द-गिर्द 'भ्रष्टाचार का मकड़जाल'
जब सरकारी सिस्टम फेल होता है, तो बिचौलियों की लॉटरी लग जाती है। RTO ऑफिस के इर्द-गिर्द सक्रिय दलाल इसी कमी का फायदा उठा रहे हैं। कार्ड जल्दी दिलाने या 'डुप्लीकेट' कार्ड निकलवाने के नाम पर लोगों से भारी भरकम अवैध वसूली की जा रही है। सवाल यह है कि जो कार्ड सरकारी खिड़की से नहीं मिल पा रहा, वह इन दलालों के पास कहां से आ रहा है?
MP ऑनलाइन पर 'दोहरी मार', जनता बेहाल
मजबूरी का नाम सिर्फ महात्मा गांधी नहीं, बल्कि आज के दौर में 'MP ऑनलाइन' बन गया है। आरटीओ से निराश होकर लोग मजबूरीवश ऑनलाइन केंद्रों पर जाकर अलग से पैसे देकर अपना कार्ड बनवा रहे हैं। यानी एक ही कार्ड के लिए जनता को दो बार भुगतान करना पड़ रहा है। यह सीधे तौर पर आम आदमी की गाढ़ी कमाई पर डकैती है।
प्रशासन को सीधी चुनौती: बिना सेवा के शुल्क क्यों?
पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों के साथ हम प्रशासन से यह सीधा सवाल पूछते हैं। जब विभाग के पास कार्ड देने की सुविधा फिलहाल उपलब्ध नहीं है, तो आवेदन के समय ही यह 200 रुपये का शुल्क क्यों काटा जा रहा है? क्या यह शासन द्वारा प्रायोजित कोई नया 'रिकवरी मोड' है या फिर जनता को लूटने की कोई सोची-समझी साजिश?
वेंडर की 'सुस्ती' या विभाग की 'मिलीभगत'?
विभाग का कहना है कि जिस वेंडर को कार्ड प्रिंटिंग और वितरण का काम सौंपा गया है, उसने अभी काम शुरू नहीं किया है। लेकिन यह दलील गले नहीं उतरती। अगर वेंडर काम नहीं कर रहा, तो उस पर पेनाल्टी क्यों नहीं लगाई जा रही? क्या वेंडर और अधिकारियों के बीच कोई ऐसी साठगांठ है जिसका खामियाजा शहडोल की जनता भुगत रही है?
चेकिंग के नाम पर चालकों का उत्पीड़न
एक तरफ विभाग कार्ड नहीं दे रहा, दूसरी तरफ पुलिस और परिवहन विभाग की चेकिंग टीमें सड़कों पर रसीद को मानने से इनकार कर देती हैं। कार्ड न होने पर चालान काट दिया जाता है। विभाग की गलती की सजा आम आदमी अपने चालान के रूप में क्यों भुगते? यह विरोधाभास प्रशासनिक विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
वैकल्पिक व्यवस्था पर क्यों साधी चुप्पी?
मांग की जा रही है कि जब तक वेंडर आपूर्ति शुरू नहीं करता, तब तक इस शुल्क पर तत्काल रोक लगाई जाए। लेकिन जिम्मेदार अधिकारी इस मुद्दे पर चुप्पी साधे बैठे हैं। क्या प्रशासन इस बात का इंतजार कर रहा है कि जनता सड़कों पर उतरे, तभी उनकी कुंभकर्णी नींद टूटेगी?
सिस्टम की साख दांव पर
शहडोल RTO की इस कार्यप्रणाली ने राज्य सरकार की 'डिजिटल इंडिया' और 'पारदर्शी प्रशासन' की दावों की हवा निकाल दी है। स्मार्ट कार्ड के नाम पर चल रहा यह खेल अब केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक संगठित आर्थिक अपराध की श्रेणी में आता दिख रहा है।
जिम्मेदारों का रटा-रटाया जवाब
आरटीओ शहडोल, अनपा खान का कहना है कि "वर्तमान में कार्ड वितरण में समस्या है। वेंडर ने काम शुरू नहीं किया है। जैसे ही काम शुरू होगा, प्राथमिकता पर कार्ड दिए जाएंगे।" लेकिन मैडम, सवाल 'कब' का नहीं, सवाल 'आज' का है। आज जो अवैध वसूली हो रही है, उसका जिम्मेदार कौन है?
अब आर-पार की जंग
हमारा अखबार इस खबर के माध्यम से प्रशासन को खुली चुनौती देता है कि या तो कार्ड वितरण की व्यवस्था दुरुस्त की जाए, या फिर अवैध रूप से लिए जा रहे 200 रुपये का शुल्क बंद हो। जब तक वेंडर की आपूर्ति बहाल नहीं होती, तब तक जनता से पैसा वसूलना बंद करें, अन्यथा यह आंदोलन थमने वाला नहीं है। संपादकीय टिप्पणी: सरकारी तंत्र की इस लूट के खिलाफ हम चुप नहीं बैठेंगे। यह खबर केवल सूचना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है उन तमाम भ्रष्ट अधिकारियों और बिचौलियों को जो जनता के पसीने की कमाई को अपनी जागीर समझ बैठे हैं।
