तीन-तीन नेशनल हाईवे के मुहाने पर एक भी न्यूरोसर्जन नहीं
Junaid Khan - शहडोल। संभाग के सबसे बड़े चिकित्सा केंद्र, बिरसा मुंडा शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय की बदहाली को लेकर समाचार पत्रों में प्रकाशित खोजी रिपोर्ट का शासन-प्रशासन स्तर पर गहरा असर देखने को मिला है। समाचारों में उठाई गई गंभीर चिंताओं के बाद यद्यपि प्रशासनिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है, परंतु धरातल पर सच्चाई आज भी जस की तस भयावह बनी हुई है। वर्ष 2019 में 100 एमबीबीएस सीटों की बड़ी घोषणा के साथ शुरू हुआ यह महत्वाकांक्षी मेडिकल कॉलेज पांच वर्ष बीत जाने के बाद भी अपनी बुनियादी सुविधाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के कारण महज एक 'जिला अस्पताल-2' बनकर सिमट गया है। विडंबना देखिए कि शहडोल, उमरिया और अनूपपुर जैसे आदिवासी बाहुल्य जिलों की करीब 18 लाख की विशाल आबादी को गंभीर न्यूरो और कार्डियोलॉजिकल बीमारियों के इलाज के लिए आज भी जबलपुर, रीवा, बिलासपुर या सीधे नागपुर की ओर पलायन करने को मजबूर होना पड़ रहा है। जिम्मेदार तंत्र केवल फाइलों को एक टेबल से दूसरे टेबल पर खिसकाने में व्यस्त है, जबकि जनता बुनियादी इलाज के लिए तरस रही है।
तीन नेशनल हाईवे और मौत का खूनी आंकड़ा (सीधी चुनौती)
इस पूरी लचर व्यवस्था की सबसे खतरनाक और संवेदनशील सच्चाई यह है कि यह पूरा संभाग तीन प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों—NH-43, NH-39, और NH-543 के मुहाने पर स्थित है। इन मार्गों पर आए दिन होने वाले भीषण सड़क हादसों में से 90 प्रतिशत मामले सीधे तौर पर 'हेड इंजरी' (सिर की गंभीर चोट) के होते हैं। ऐसे आपातकालीन समय में मरीजों के लिए शुरुआती पहला घंटा यानी 'गोल्डन आवर' जीवन और मृत्यु का फैसला करता है। परंतु, संभाग के इस एकमात्र मेडिकल कॉलेज में एक भी न्यूरोसर्जन का पद स्वीकृत तक नहीं होना सीधे तौर पर प्रशासनिक असंवेदनशीलता और जनता के जीवन के साथ सरेआम खिलवाड़ को दर्शाता है। प्राथमिक उपचार के नाम पर केवल औपचारिक 'रेफर' का ठप्पा लगा दिया जाता है, जिसके कारण हर महीने 20 से अधिक गरीब आदिवासी मरीज रीवा-जबलपुर के रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं, जबकि इससे दोगुने मरीज महंगे और निजी इलाज के लिए नागपुर भागने को विवश हैं। यह अवैध रूप से अपनी जेबें भरने वाले निजी एम्बुलेंस संचालकों और दलालों के गठजोड़ को भी खुली चुनौती है जो मजबूरी का फायदा उठाते हैं।
डॉक्टरों का टोटा,वेंटिलेटर पर पूरा अस्पताल तंत्र
सरकारी फाइलों और स्वीकृतियों का पोस्टमार्टम करें तो आंकड़े चौकाने वाले और स्वास्थ्य मंत्रालय को आईना दिखाने वाले हैं। संस्थान में स्वीकृत 179 पदों के मुकाबले 60 से अधिक पद आज भी खाली पड़े हैं। मेडिसिन और सर्जरी जैसे अति-महत्वपूर्ण कोर विभागों में कोई भी स्थाई सीनियर डॉक्टर उपलब्ध नहीं है, और पूरे चिकित्सा महाविद्यालय का भार सिर्फ दो महिला रोग विशेषज्ञों के भरोसे टिका हुआ है। इसके अलावा एनेस्थीसिया, रेडियोलॉजी और पैथोलॉजी जैसे रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले विभागों में भी मैनपावर का भारी संकट है। गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी, कार्डियोलॉजी, नेफ्रोलॉजी और यूरोलॉजी जैसी सुपर स्पेशलिटी सेवाएं तो यहाँ के निवासियों के लिए केवल एक हसीन सपना बनकर रह गई हैं, जबकि वर्तमान में कॉलेज से संबद्ध 750 बिस्तरों का विशाल अस्पताल केवल कागजी कोरम और सामान्य ओपीडी चलाने के काम आ रहा है। 200 से 350 किलोमीटर की यह दूरी कई गरीब परिवारों के लिए इलाज छूटने और असमय मौत का कारण बन रही है।
अधिकारियों के बहाने और 'विन्ध्य सत्ता' के तीखे सवाल
इस पूरे मामले पर जब चिकित्सा शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों से तीखे सवाल किए गए, तो उन्होंने हमेशा की तरह एमसीआई (MCI) और एनएमसी (NMC) के कड़े मापदंडों, फैकल्टी की कमी, पीजी सीटों और उपकरणों की अनुपलब्धता का पुराना प्रशासनिक रोना रो दिया। हालांकि, मेडिकल कॉलेज के अधीक्षक डॉ. नागेंद्र सिंह ने भी स्पष्ट तौर पर स्वीकार किया है कि यहां न्यूरोसर्जन और अन्य सुपर स्पेशलिटी विभागों की तत्काल आवश्यकता है, जिसके लिए शासन स्तर पर बड़े प्रयासों की दरकार है। बड़ा सवाल यह उठता है कि जब भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, रीवा और सागर जैसे शहरों को आसानी से सुपर स्पेशलिटी का दर्जा मिल सकता है, तो फिर आदिवासी बाहुल्य शहडोल संभाग के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों? क्या यहां की 18 लाख जनता के जीवन की कोई कीमत नहीं है? 'दैनिक प्रदेश सत्ता' प्रशासन से सीधे शब्दों में जवाब मांगता है कि इस लचर व्यवस्था के पीछे छिपे लापरवाह तंत्र पर आख़िरकार कार्रवाई कब होगी?
आबादी प्रभावित,18 लाख से अधिक (शहडोल, उमरिया, अनूपपुर)
सड़क हादसों का जाल: 03 मुख्य नेशनल हाईवे (NH-43, NH-39, NH-543) जहां 90% केस हेड इंजरी के आते हैं।
पदों का गणित: 179 स्वीकृत पदों में से 60 से अधिक पद खाली।
दुर्दशा: पूरे कॉलेज में सिर्फ 02 महिला रोग विशेषज्ञ, न्यूरोसर्जन का पद अब तक स्वीकृत भी नहीं।
पलायन: हर महीने 20 से ज्यादा गंभीर केस रेफर, दूरी 200 से 350 किलोमीटर।
