स्वास्थ्य व्यवस्था की 'रीढ़' का सब्र टूटा,शहडोल में ANM ने खोला मोर्चा, प्रशासन को 15 दिन का अल्टीमेटम, ठप हो सकती हैं स्वास्थ्य सेवाएं

काम का तिगुना बोझ और सुविधाओं के नाम पर 'शून्य', जेब से पैसे भरकर गर्भवती महिलाओं की जांच करने को मजबूर हैं जमीनी स्वास्थ्य कर्मी,सीएचओ-आशा के प्रोत्साहन पैकेज पर भी भड़का गुस्सा।


Junaid Khan - शहडोल। जिले की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था को अपने कंधों पर टिकाए रखने वाली एएनएम (Auxiliary Nurse Midwife) कार्यकर्ताओं ने अब प्रशासनिक शोषण और सरकारी बेरुखी के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। संयुक्त एएनएम एसोसिएशन के बैनर तले कलेक्ट्रेट परिसर में गरजे आक्रोश ने जिला प्रशासन के कान खड़े कर दिए हैं। एएनएम कार्यकर्ताओं ने दोटूक शब्दों में 15 दिनों का अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी है कि यदि उनकी जायज मांगों को पूरा नहीं किया गया, तो पूरे जिले में स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह ठप कर उग्र आंदोलन शुरू कर दिया जाएगा। सन् 1950 से स्वास्थ्य विभाग के सबसे पुराने और मजबूत कैडर के रूप में काम कर रही इन स्वास्थ्य कर्मियों की यह ललकार सीधे तौर पर उस प्रशासनिक तंत्र को चुनौती है, जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर जमीनी हकीकत से आंखें मूंदे हुए है। व्यवस्था की विडंबना देखिए कि सरकारी गाइडलाइन के नियमों को ताक पर रखकर एक-एक एएनएम कार्यकर्ता से छह से नौ हजार की आबादी को संभालने का अमानवीय श्रम लिया जा रहा है, जबकि नियमन यह सीमा महज दो से तीन हजार की है। यानी तय मापदंडों से दोगुना-तिगुना काम और बदले में सुविधाएं बिल्कुल 'जीरो'। आक्रोश इस बात पर भी चरम पर है कि मातृत्व-शिशु स्वास्थ्य से लेकर पोलियो उन्मूलन और कोविड टीकाकरण जैसी हर राष्ट्रीय सफलता को अपनी मेहनत से सींचने वाली एएनएम को आज प्रताड़ना मिल रही है। जमीनी स्तर पर लक्ष्य (Target) पूरा न होने की गाज तो एएनएम पर गिरा दी जाती है, लेकिन जब प्रोत्साहन राशि (Incentive) बांटने की बात आती है, तो नियम बदल जाते हैं। प्रदर्शनकारी एएनएम ने साफ आरोप लगाया कि सीएचओ (CHO) को मिलने वाले 15,000 रुपये प्रति माह के पीबीआई (Performance Based Incentive) और आशा कार्यकर्ताओं को मिलने वाले लाभ के मुकाबले उनके साथ घोर भेदभाव किया जा रहा है। सबसे ज्यादा हैरान करने वाला और प्रशासनिक भ्रष्टाचार व ढुलमुल नीति को उजागर करने वाला मामला आयुष्मान आरोग्य मंदिर के फंड से जुड़ा है। यहां मिलने वाला 50 हजार रुपये का अनटाइड फंड 'जन आरोग्य समिति' के खाते में जाता है, लेकिन धरातल पर कड़वी सच्चाई यह है कि गर्भवती महिलाओं की जांच के लिए जरूरी बुनियादी सामान और मेडिकल किट भी एएनएम को अपनी जेब से पैसे खर्च कर खरीदने पड़ रहे हैं। इस आर्थिक और मानसिक शोषण के खिलाफ अब संविदा पर काम कर रही एएनएम कार्यकर्ताओं ने नियमितीकरण की मांग को लेकर अपनी आवाज बुलंद कर दी है। दुर्गम पहाड़ी और आदिवासी अंचलों में शत-प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाएं देने वाली इन जांबाज कर्मियों की हड़ताल यदि शुरू होती है, तो शहडोल संभाग की पूरी स्वास्थ्य प्रणाली वेंटिलेटर पर आ जाएगी, जिसकी पूरी जिम्मेदारी केवल और केवल गूंगे-बहरे प्रशासनिक अमले की होगी।

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