प्रशासनिक नाकामी की ढाल तले पनप रहा 'अवैध कब्जा राज'क्या नगर पालिका की साठगांठ से बंधक बना शहडोल बस स्टैंड?

अखबार में छपी खबर के बाद भी कुंभकर्णी नींद में जिम्मेदार,सिर्फ कागजी 'हिदायत' देकर खानापूर्ति कर रहा अमला, यात्रियों का जीना मुहाल


Junaid Khan - शहडोल। जिला मुख्यालय का मुख्य बस स्टैंड इस समय स्थानीय प्रशासन की अकर्मण्यता और भू-माफियानुमा रसूखदारों के अवैध मंसूबों का जीवंत अड्डा बन चुका है। जिस परिसर का निर्माण करोड़ों की लागत से आम जनता और दूर-दराज से आने वाले यात्रियों की सुविधा, उनके बैठने और बसों के सुचारू संचालन के लिए किया गया था, उसे आज नगर पालिका और प्रशासनिक अफसरों की नाक के नीचे 'अवैध पार्किंग स्टैंड' और लालची दुकानदारों के 'अवैध साम्राज्य' में तब्दील कर दिया गया है। पूर्व में इस गंभीर मुद्दे पर समाचार प्रकाशित होने और तीखा असर दिखने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी है। यह सुस्ती सीधे तौर पर संकेत देती है कि इस महा-अव्यवस्था के पीछे कहीं न कहीं कोई गहरा प्रशासनिक संरक्षण या बड़ी साठगांठ काम कर रही है। आखिर क्या वजह है कि रसूखदार अतिक्रमणकारियों के सामने पूरा सरकारी अमला इस कदर नतमस्तक और लाचार नजर आ रहा है?

जमीनी हकीकत,जनता का दर्द और दिखावे की 'खानापूर्ति' 

बस स्टैंड परिसर के भीतर का आलम यह है कि यहां अब यात्रियों को खड़े होने तक की जगह नसीब नहीं हो रही है। परिसर के भीतर केवल अनधिकृत गाड़ियां ही मनमाने ढंग से नहीं खड़ी हो रही हैं, बल्कि वहां के स्थानीय दुकानदारों ने नियमों को ताक पर रखकर अपनी दुकानों को कई-कई फीट आगे बढ़ाकर पूरे सार्वजनिक परिसर पर अवैध कब्जा जमा लिया है। स्कूटर, मोटरसाइकिल और अनधिकृत वाहनों की बेतरतीब कतारों के कारण यात्रियों का पैदल चलना तक दूभर हो चुका है। सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जब भी जनता की आवाज बुलंद होती है, तो नगर पालिका के चंद कर्मचारी रस्म अदायगी करने और 'दिखावे की कार्रवाई' का ढोंग रचने बस स्टैंड पहुंच जाते हैं। वहां केवल मौखिक हिदायत देकर ऐसी 'खानापूर्ति' की जाती है कि उनके पीठ फेरते ही फिर वही पुराना अवैध खेल शुरू हो जाता है। यह कागजी हिदायत और वसूली का संदेह पैदा करने वाला खेल अब जनता के सब्र का बांध तोड़ रहा है।

नियमों की धज्जियां और भ्रष्ट तंत्र को सीधी चेतावनी

नियमों और वैधानिक प्रावधानों के अनुसार बस स्टैंड परिसर के भीतर अनाधिकृत पार्किंग और दुकानों का बाहर निकलना पूरी तरह प्रतिबंधित और दंडनीय अपराध है, लेकिन शहडोल में इन नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सवाल यह उठता है कि जब नियम स्पष्ट हैं, तो उनका कड़ाई से पालन करवाने की जिम्मेदारी किसकी है? क्या शहडोल का जिला प्रशासन और नगर पालिका परिषद केवल टैक्स वसूलने और जनता को लावारिस छोड़ने के लिए बैठी है? 'दैनिक विंध्य सत्ता' सीधे तौर पर जिम्मेदार आला अधिकारियों को चुनौती देता है कि वे अपनी इस रहस्यमयी खामोशी को तोड़ें और इस 'अवैध कब्जा राज' पर तत्काल बुल्डोजर चलाकर परिसर को मुक्त कराएं, अन्यथा यह साफ मान लिया जाएगा कि इस पूरे सिंडिकेट में भ्रष्टाचार की जड़ें ऊपर तक जुड़ी हुई हैं। जनता अब खोखले आश्वासनों से मानने वाली नहीं है, उसे धरातल पर ठोस और दंडात्मक कार्रवाई चाहिए।

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