चमकदार दीवारों के पीछे बदहाली का सच,आधे घंटे की रिमझिम बारिश ने खोली शहडोल जिला अस्पताल की 'मॉडल' व्यवस्थाओं की पोल
Junaid Khan - शहडोल। शासन-प्रशासन द्वारा स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के बड़े-बड़े दावों और करोड़ों रुपये के बजट को जिला मुख्यालय का कुशाभाऊ ठाकरे जिला चिकित्सालय किस कदर ठेंगा दिखा रहा है, इसका जीता-जागता उदाहरण आज देखने को मिला। महज आधे घंटे की हल्की-फुल्की रिमझिम बरसात ने अस्पताल प्रबंधन और जिला प्रशासन की तैयारियों को पूरी तरह से जलमग्न कर दिया। अस्पताल के गेट नंबर 2 पर इस कदर पानी भर गया कि वह किसी तालाब का रूप ले चुका था। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस गेट से चौबीसों घंटे गंभीर मरीजों, लाचार बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं का आना-जाना लगा रहता है, वहां इस कदर जलजमाव होना अधिकारियों की घोर लापरवाही और संवेदनहीनता को दर्शाता है। जरा सोचिए, जब जिला अस्पताल के मुख्य प्रवेश द्वार का यह हाल है, तो अंदर की स्थिति कितनी भयावह होगी? यह नजारा देखने के बाद आम जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अस्पताल सिर्फ बाहर से चमकाने के लिए है?
करोड़ों की 'पेंटिंग' और 'दीदी कैफे' से किसे फायदा? बुनियादी इलाज और रास्ते आज भी भगवान भरोसे
अस्पताल को एक कॉरपोरेट लुक देने के लिए बाहर 'मॉडल रोड' बना दी गई, दीवारों पर चमचमाती पेंटिंग कर दी गई और अंदर फाइव स्टार होटल की तर्ज पर 'दीदी कैफे' और रेस्टोरेंट टाइप व्यवस्थाएं खड़ी कर दी गईं। लेकिन बुनियादी जरूरतें आज भी रसातल में हैं। दुनिया भर का तामझाम और फिजूलखर्ची करने का आखिर क्या मतलब, जब इलाज के लिए आने वाले मरीजों को मुख्य द्वार पर ही घुटने भर पानी और कीचड़ से होकर गुजरना पड़े? अस्पताल परिसर के भीतर आए दिन बेड की किल्लत, वार्डों में गंदगी और प्रशासनिक लापरवाही की खबरें आम हो चुकी हैं। आज की इस मामूली बारिश ने यह साबित कर दिया है कि करोड़ों का यह बजट सिर्फ और सिर्फ ऊपरी दिखावे और कागजी खानापूर्ति में बहा दिया गया, जबकि धरातल पर मरीजों को मिलने वाली सहूलियतें आज भी शून्य हैं।
जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को खुली चुनौती,मुख्य द्वार के गड्ढे नहीं भर पा रहे, तो पूरे शहर को कैसे बचाएंगे?
गेट नंबर 2 के ठीक सामने पानी का यह भराव किसी बड़े हादसे को खुला निमंत्रण दे रहा है। जलजमाव के कारण नीचे गहरे गड्ढे छिप गए हैं, जहां से गुजरते वक्त यदि कोई मरीज या तीमारदार अनियंत्रित होकर गिर जाए, तो उसकी जान पर बन आना तय है। यह स्थिति जिम्मेदार अधिकारियों और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है। यह उन तमाम दावों को खुली चुनौती है जो मानसून से निपटने के लिए किए जाते हैं। जब जिला प्रशासन शहर के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण वीवीआईपी क्षेत्र यानी 'जिला अस्पताल' के मुहाने को दुरुस्त नहीं रख पा रहा, तो इस बरसात के मौसम में पूरे शहडोल शहर की निकासी व्यवस्था को वह कैसे संभालेगा? जिम्मेदार अधिकारी इस कदर कुंभकर्णी नींद में सोए हैं कि उन्हें मरीजों की यह बेबसी और तड़प नजर नहीं आ रही। यदि समय रहते इस गंभीर लापरवाही को नहीं सुधारा गया, तो किसी भी दिन यहां एक बड़ी जनहानि से इनकार नहीं किया जा सकता, जिसकी पूरी जिम्मेदारी अस्पताल प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन की होगी।
