कलेक्टर और एसपी दफ्तर की छत से टपक रहा खतरा, लोहे की छड़ें हुई कबाड़,पिलर का प्लास्टर छोड़ रहा साथ
बड़ा सवाल,जनता और अधिकारियों की जान दांव पर लगाकर आखिर किस 'बड़े हादसे' का इंतजार कर रहा प्रशासनिक अमला?
Junaid Khan - शहडोल। शासन और प्रशासन के सबसे बड़े केंद्र, जहां से पूरे जिले की कानून-व्यवस्था और विकास की नीतियां तय होती हैं, वही संयुक्त कलेक्टेरेट भवन आज खुद अपनी बदहाली और प्रशासनिक घोर लापरवाही पर आंसू बहा रहा है। शहडोल का यह अति-महत्वपूर्ण कलेक्टेरेट भवन, जिसमें कलेक्टर और एसपी जैसे शीर्ष अधिकारियों के कार्यालय संचालित हैं, इस समय गंभीर रूप से जर्जर होकर किसी बड़े हादसे को आमंत्रण दे रहा है। हालात इस कदर खौफनाक हो चुके हैं कि भवन की छतों में लगी लोहे की छड़ें हानिकारक स्तर तक जंग खा चुकी हैं और गल रही हैं। छत की सीलिंग से लेकर मजबूत माने जाने वाले पिलर्स का प्लास्टर अचानक भरभराकर गिर रहा है। रोजाना सैकड़ों की संख्या में अपनी फरियाद लेकर आने वाले आम नागरिक और दिन-रात ड्यूटी करने वाले शासकीय कर्मचारी हर पल सिर पर मंडराते इस अदृश्य मौत के साए में काम करने को मजबूर हैं। सरकारी फाइलों में मरम्मत के नाम पर आंकड़े तो बुने जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर कछुआ गति से चलती व्यवस्था यह बताने के लिए काफी है कि जिम्मेदार अधिकारी किसी बड़े जानमाल के नुकसान के बाद ही जागेंगे। इस गंभीर और संवेदनशील मामले पर प्रशासनिक लीपापोती का दौर भी शुरू हो गया है। मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए कलेक्टर डॉ. केदार सिंह ने बताया कि कलेक्टेरेट भवन की मरम्मत और जीर्णोद्धार के लिए 3 करोड़ रुपए की भारी-भरकम राशि मंजूर की गई है, और निविदा (टेंडर) प्रक्रिया पूरी होते ही जल्द ही काम शुरू कराया जाएगा। लेकिन यहाँ यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि जब भवन की रीढ़ यानी लोहे के सरिये और पिलर अंदर से खोखले हो चुके हैं, तो क्या महज 03 करोड़ रुपए का यह 'सरकारी मरहम' इस भरभराते ढांचे को बचा पाएगा या यह राशि भी ठेकेदारों और इंजीनियरों के गठजोड़ की भेंट चढ़ जाएगी? इतना ही नहीं, कलेक्टेरेट के भीतर बढ़ते इस खतरे और भीड़ के दबाव को देखते हुए अब शहर के अंदर संचालित हो रहे विभिन्न शासकीय कार्यालयों को शहर से बाहर शिफ्ट करने की भी सुगबुगाहट तेज हो गई है। प्रशासन की इस 'शिफ्टिंग थ्योरी' और 'टेंडर के इंतजार' के बीच सबसे बड़ा संकट उन निर्दोष कर्मचारियों और ग्रामीणों पर है, जो रोजाना अपनी जान हथेली पर रखकर इस जर्जर इमारत की चौखट लांघते हैं। प्रशासन को अब कागजी कसरत छोड़, युद्ध स्तर पर ठोस कदम उठाने होंगे, अन्यथा शहडोल कलेक्टेरेट का यह ढहता प्लास्टर किसी दिन बहरे सिस्टम को जगाने के लिए एक बड़ी तबाही का गवाह बन सकता है।
