शहडोल स्टेशन पर खतरनाक प्लेटफॉर्म दे रहे हादसों को न्योता, रेंगती रफ्तार ने बढ़ाई यात्रियों की आफत
Junaid Khan - शहडोल। रेलवे स्टेशनों की सूरत बदलने और यात्रियों को विश्वस्तरीय आधुनिक सुविधाएं मुहैया कराने के दावे के साथ शुरू की गई केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी 'अमृत भारत स्टेशन योजना' शहडोल में कछुआ चाल और प्रशासनिक घोर लापरवाही का शिकार होकर रह गई है। रेलवे प्रशासन द्वारा स्टेशन भवन के बाहरी स्वरूप को चमकाकर कागजों पर भले ही अपनी पीठ थपथपाई जा रही हो, लेकिन धरातल की कड़वी सच्चाई यह है कि करोड़ों रुपये फूंकने के बाद भी आम मुसाफिर आज भी अपनी बुनियादी जरूरतों और सुरक्षा के लिए स्टेशन पर हर दिन जंग लड़ रहा है। आधुनिकता के बड़े-बड़े विज्ञापनों के बीच शहडोल रेलवे स्टेशन की जमीनी हकीकत आज प्रशासनिक दावों को खुली चुनौती दे रही है, जहां चकाचौंध के पीछे केवल अव्यवस्थाओं और लेती-लतीफी का अंधकार पसरा हुआ है।
प्लेटफॉर्म नंबर 2 और 3 बने 'मुसीबत का टापू', कम ऊंचाई खोल रही काम की पोल
स्टेशन पर सबसे भयावह और जानलेवा स्थिति प्लेटफॉर्म क्रमांक 2 और 3 पर बनी हुई है, जिसके पिछले हिस्से में फर्श और प्लेटफॉर्म को ऊंचा करने का निर्माण कार्य महीनों से कतई बंद या कछुआ गति से चल रहा है। हालत यह है कि जब लंबी दूरी की एक्सप्रेस या सुपरफास्ट ट्रेनें स्टेशन पर आकर रुकती हैं, तो उनके कई डिब्बे प्लेटफॉर्म के उसी अधूरे और नीचे रह गए हिस्से में जाकर खड़े होते हैं, जहां प्लेटफॉर्म की ऊंचाई ट्रेन के पायदान (दरवाजे) से कई फीट नीचे रह जाती है। ऐसी बदतर स्थिति में भारी-भरकम सामान के साथ महिलाओं, दुधमुंहे बच्चों, लाचार बुजुर्गों और गंभीर मरीजों को ट्रेन के भीतर चढ़ने और उतरने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ती है। कई बार तो यात्रियों को जान जोखिम में डालकर ऊंची छलांग लगानी पड़ती है, जिससे किसी भी वक्त कोई बड़ा और दर्दनाक हादसा घटित हो सकता है।
महज दो मिनट का स्टॉपेज और ऊपर से बारिश का मौसम, यात्रियों के सब्र का इम्तिहान
आने वाले दिनों में मानसून की दस्तक के साथ ही यह जानलेवा परेशानी कई गुना और बढ़ने वाली है। बारिश के दिनों में खुले और अधूरे पड़े प्लेटफॉर्म पर कीचड़ और फिसलन के कारण यात्रियों के पैर फिसलने और सीधे पटरी पर गिरने का अंदेशा हर पल बना रहता है। इसके ऊपर कोढ़ में खाज यह है कि शहडोल स्टेशन पर लंबी दूरी की अधिकांश वीआईपी ट्रेनों का ठहराव महज दो मिनट का होता है। इतने कम समय में यात्रियों को अपने भारी सामान के साथ उस नीचे धंसे हुए प्लेटफॉर्म से सुरक्षित तरीके से डिब्बे के भीतर पहुंचना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता। प्रशासन की यह सुस्ती साफ तौर पर यात्रियों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने जैसी है, जो सीधे तौर पर रेलवे प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है।
ठेकेदार की मनमानी और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी, आखिर कब जागेगा कुंभकर्णी प्रशासन?
स्थानीय जनता और दैनिक यात्रियों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि ठेकेदार की खुलेआम लापरवाही और मनमानी के चलते यह काम समय सीमा बीतने के बाद भी पूरा नहीं हो पा रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि निर्माण कार्य में हो रही इस गंभीर धांधली और देरी को लेकर न तो रेलवे के जिम्मेदार उच्च अधिकारी सुध ले रहे हैं और न ही क्षेत्र के जनप्रतिनिधि इस गंभीर जनसमस्या पर आवाज उठाने की जहमत उठा रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि पूरा तंत्र किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है। जनता अब सीधे तौर पर प्रशासन को चुनौती दे रही है कि यदि समय रहते इस अधर में लटके निर्माण कार्य को युद्धस्तर पर पूरा नहीं कराया गया, तो मुसाफिरों का यह आक्रोश कभी भी उग्र आंदोलन का रूप अख्तियार कर सकता है।
