मानकों को दिखाया अंगूठा तकनीकी मापदंडों का सरेआम कत्ल; सूखी जमीन पर गिट्टी बिछाकर लिखी जा रही घटिया निर्माण की नई इबादत, मौन साधे बैठा अमला
Junaid Khan - शहडोल। जिले के जनपद पंचायत जयसिंहनगर के अंतर्गत विकास और निर्माण के नाम पर सरकारी खजाने को चूना लगाने का एक बेहद सनसनीखेज और गंभीर मामला प्रकाश में आया है। ग्राम पंचायत कतिरा के ग्राम खुशरवाह में इन दिनों विकास के दावों की धज्जियां उड़ाते हुए सरकारी राशि को मटियामेट करने की नई इबादत लिखी जा रही है। सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के मुताबिक, यहाँ लगभग पांच लाख रुपए की भारी-भरकम लागत से एक पुलिया निर्माण का कार्य कराया जा रहा है। विडंबना देखिए कि यह काम अभी अपने प्रारंभिक चरण में ही है, लेकिन शुरुआत से ही निर्माणाधीन पुलिया तमाम तकनीकी मानकों को ठेंगा दिखा रही है। धरातल पर हो रहा यह खेल साफ गवाही दे रहा है कि कैसे जनता के टैक्स के पैसे को मिलीभगत की भेंट चढ़ाया जा रहा है।
सूखी जमीन पर कोरम पूर्ति, उपयंत्री की रहस्यमयी चुप्पी पर खड़े हुए बड़े सवाल
मौके का मुआयना करने पर जो जमीनी हकीकत सामने आई है, वह न केवल चौंकाने वाली है बल्कि सीधे तौर पर जिला प्रशासन की साख को खुली चुनौती दे रही है। पुलिया निर्माण के लिए जो बुनियादी नियम तय हैं, उन्हें पूरी तरह हवा में उड़ा दिया गया है। मौके पर गड्ढे की गहराई निर्धारित मानकों से बेहद कम पाई गई है। हद तो तब हो गई जब बेस (आधार) ढालने के लिए इस्तेमाल की जा रही गिट्टी का साइज भी स्वीकृत मापदंडों पर रत्ती भर भी खरा नहीं उतरा। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि बिना सीमेंट और रेत का उचित लेप या उपयोग किए, सूखी जमीन पर ही सीधे गिट्टी की ढलाई की जा रही है। महज़ 'कोरम पूर्ति' के लिए किए जा रहे इस घटिया निर्माण ने संबंधित उपयंत्री (सब-इंजीनियर) की भूमिका पर भी गहरा सस्पेक्ट खड़ा कर दिया है। तकनीकी अधिकारी का इस कदर मूकदर्शक बने रहना या आंखें मूंद लेना, इस भ्रष्टाचार में उनकी मूक सहमति की ओर इशारा करता है। सत्ता की हनक और रसूखदारों के आगे बेबस तंत्र, क्या जागेंगे जिम्मेदार अधिकारी? अखबार में पूर्व में आई कतिपय चर्चाओं और स्थानीय सुगबुगाहटों पर गौर करें तो इस पूरे अवैध और घटिया निर्माण के पीछे कथित तौर पर रसूखदार ठेकेदार अरुण गौतम (भाजपा नेता) का नाम सामने आ रहा है। राजनैतिक रसूख और सत्ता की हनक के दम पर नियम-कायदों को ताक पर रखकर किए जा रहे इस घटिया निर्माण ने प्रशासनिक इकबाल को कटघरे में खड़ा कर दिया है। यह सीधे तौर पर उन अधिकारियों को चुनौती है जो कागजों पर जीरो टॉलरेंस का दावा करते हैं। क्या शहडोल का जिला प्रशासन और जनपद पंचायत का शीर्ष नेतृत्व इस खुली मनमानी पर अंकुश लगाने का माद्दा दिखा पाएगा? या फिर रसूख के रंगे इस खेल में यह पांच लाख की पुलिया पहली ही बरसात में बहने के लिए छोड़ दी जाएगी? क्षेत्र की जनता अब इस पर जवाबदेही और दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त दंडात्मक कार्रवाई की मांग कर रही है।
