शहडोल से उठी विरोध की चिंगारी, सरकार के 'समानता' के दावे पर खड़े हुए गंभीर सवाल!
प्रशासनिक बंदोबस्त और चुनावी एजेंडे को सीधी चुनौती: जमीयत उलमा-ए-हिन्द ने कलेक्टर के जरिए यूसीसी समिति को भेजा कड़ा आपत्ति पत्र; कहा- 'संविधान की मूल भावना और शरिया से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं'
Junaid khan - शहडोल। मध्य प्रदेश मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू करने की प्रशासनिक तैयारियों और सरकार के 'एक देश, एक कानून' के दावों को धरातल पर तगड़ी चुनौती मिलनी शुरू हो गई है। शाहडोल संभाग से लेकर पूरे प्रदेश के मुस्लिम और आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में इस प्रस्तावित कानून को लेकर असंतोष का उबाल साफ देखा जा रहा है। मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब 'जमीयत उलमा-ए-हिन्द' (इकाई-शाहडोल) ने सीधे सूबे की यूसीसी समिति की अध्यक्षा न्यायमूर्ति (से.नि.) रंजना प्रकाश देसाई और अन्य सदस्यों के नाम कलेक्टर को एक बेहद तीखा और विस्तृत आपत्ति पत्र सौंप दिया। इस कदम ने न सिर्फ स्थानीय प्रशासन के कान खड़े कर दिए हैं, बल्कि भोपाल से लेकर दिल्ली तक बैठे नीति-निर्धारकों के उस 'समानता और एकरूपता' के तर्क को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है, जिसके नाम पर इस कानून का मसौदा तैयार किया जा रहा है।
लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता पर तीखा प्रहार,अनैतिकता को संरक्षण देने की प्रशासनिक जिद क्यों?'
इस पूरे मसौदे में सबसे बड़ा विवाद और प्रशासनिक नीति को चुनौती देने वाला बिंदु 'लिव-इन रिलेशनशिप' का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन और उसे कानूनी मान्यता देना बना हुआ है। ज्ञापन में इस व्यवस्था को भारतीय सामाजिक ताने-बाने, सनातन पारिवारिक मूल्यों और इस्लामी शरिया (पवित्र कुरान व सुन्नत) पर सीधा प्रहार बताया गया है। जानकारों का कहना है कि एक तरफ सरकार सामाजिक सुधारों की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ बिना निकाह या विवाह के पुरुष और महिला का एक साथ रहना (जिसे व्यभिचार/जिना की श्रेणी में माना गया है) को कानूनन संरक्षण देकर समाज में उच्छृंखलता को बढ़ावा दे रही है। अखबार के लिए यह एक बड़ा सवाल है कि क्या प्रशासन और सरकार कानून की आड़ में उस अनैतिक व्यवस्था को वैध बनाने पर आमादा हैं, जो समाज के पारिवारिक ढांचे को पूरी तरह नष्ट कर देगी? इस अनिवार्य रजिस्ट्रेशन के खिलाफ उठी आवाज सीधे तौर पर सरकार की सामाजिक प्राथमिकताओं को कटघरे में खड़ा करती है।
शरिया अदालतों में दखल और 20% आदिवासी आबादी का गणित,समानता' के दोहरे मापदंड उजागर!
खबर का सबसे पुख्ता और सरकार को घेरने वाला पहलू मध्य प्रदेश की भौगोलिक वास्तविकता है। प्रदेश में लगभग 20% आबादी आदिवासी समुदायों की है। सरकार ने आश्वासन दिया है कि उत्तराखंड और गुजरात की तर्ज पर यहाँ भी आदिवासियों के पारंपरिक कानूनों, रीति-रिवाजों और अधिकारों को यूसीसी से बाहर रखकर पूरी सुरक्षा दी जाएगी। इसी बिंदु पर विरोध करने वालों ने प्रशासन को तार्किक रूप से पछाड़ दिया है। यदि 20% आबादी को इस कानून से बाहर रखा जा रहा है, तो फिर सरकार का 'समानता' और 'एकरूपता' का दावा खुद-ब-खुद दम तोड़ देता है! इसके अलावा निकाह (जो एक सिविल कॉन्ट्रैक्ट है), तलाक, खुला और विरासत (शरियत एप्लीकेशन एक्ट, 1937) जैसे स्थापित धार्मिक अधिकारों में सरकारी अफसरों और अफसरशाही का सीधा हस्तक्षेप बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) का हवाला देते हुए इस कानून को पूरी तरह असंवैधानिक और संघीय ढांचे पर आघात करार दिया गया है, जिसने आने वाले दिनों में एक बड़े सामाजिक और कानूनी आंदोलन की नींव रख दी है।
