बेपटरी हुईं जीवनरक्षक सेवाएं मेडिकल कॉलेज प्रशासन की आंखें कब खुलेंगी,बैकअप व्यवस्था फुस्स,मरीजों की जान से खिलवाड़
Junaid Khan - शहडोल। सरकारी दावों और बड़े-बड़े वादों की हवा निकालते हुए बिरसामुंडा शासकीय मेडिकल कॉलेज एवं संबद्ध अस्पताल में सोमवार देर रात एक बड़ा और शर्मनाक प्रशासनिक हुल्लड़ सामने आया। सोमवार रात लगभग 12.00 बजे अचानक गुल हुई बिजली मंगलवार सुबह 07.00 बजे तक यानी लगातार 7 घंटे तक ठप रही। स्वास्थ्य महकमे और स्थानीय जिला प्रशासन की घोर लापरवाही का आलम यह रहा कि पूरा अस्पताल परिसर घंटों तक घुप्प अंधेरे के आगोश में डूबा रहा और तड़पते मरीजों को देखने वाला कोई जिम्मेदार मौजूद नहीं था। जीवनरक्षक उपकरणों से लैस इस तथाकथित हाईटेक अस्पताल में बैकअप और जनरेटर व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह गई। रातभर आईसीयू, पैथोलॉजी लैब, डायलिसिस यूनिट और नवजात शिशुओं (एसएनसीयू/एनआईसीयू) के वार्डों में चीख-पुकार मचती रही, लेकिन संवेदनहीन प्रबंधन गहरी नींद में सोया रहा। यह केवल तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर सैकड़ों असहाय मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ करने जैसी संगीन लापरवाही है, जिस पर अब तक किसी जिम्मेदार अधिकारी का न जागना सीधे तौर पर जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की साख पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। इलाज कराने आए मरीजों के परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन की इस अक्षम्य नाकामी पर तीखा आक्रोश जताया है। राजेंद्रग्राम से अपने गंभीर मरीज का इलाज कराने पहुंचे रामगोपाल सिंह ने प्रशासनिक लापरवाही की पोल खोलते हुए बताया कि “अंधेरा छाते ही चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई। अस्पताल प्रशासन की तरफ से कोई स्पष्ट जानकारी देने तक के लिए आगे नहीं आया। वैकल्पिक व्यवस्था के नाम पर किए गए दावे पूरी तरह खोखले साबित हुए, जिससे अंधेरे में गंभीर मरीजों को शिफ्ट करने में भारी दिक्कतें आईं। परिजनों का स्पष्ट कहना है कि यदि समय रहते भारी-भरकम जनरेटरों को पूरी क्षमता के साथ शुरू कर दिया जाता, तो नवजात बच्चों और डायलिसिस पर निर्भर मरीजों को जिंदगी और मौत के बीच झूलना नहीं पड़ता। इस पूरे मामले में जब मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. जीबी रामटेके से जवाब मांगा गया, तो उन्होंने महज़ एक औपचारिक बयान देकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की कि “बिजली की समस्या तकनीकी कारणों से आई थी, जिसे बाद में ठीक करा लिया गया है।” सवाल यह उठता है कि क्या तकनीकी खराबी का बहाना बनाकर मरीजों की जान जोखिम में डालने वाले जिम्मेदार अधिकारियों पर जिला प्रशासन कठोर दंडात्मक कार्रवाई करेगा, या फिर किसी बड़े हादसे के इंतजार में इस तरह की जानलेवा लापरवाही को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
