हाईकोर्ट का भी खौफ नहीं,संभाग में सुस्त न्याय व्यवस्था,15 दिन का आदेश, 06 महीने से दबाई फाइल

हाईकोर्ट का भी खौफ नहीं,संभाग में सुस्त न्याय व्यवस्था,15 दिन का आदेश, 06 महीने से दबाई फाइल 


Junaid Khan - शहडोल। प्रशासनिक अमला जब अपनी जिम्मेदारी भूलकर फाइलों को दबाने की जिद पर अड़ जाए, तो माननीय उच्च न्यायालय के आदेश भी दफ्तरों की धूल फांकने को मजबूर हो जाते हैं। ऐसा ही एक गंभीर और व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने वाला मामला शहडोल संभागायुक्त कार्यालय से सामने आया है। दरअसल, आदिवासी कन्या परिसर कंचनपुर से छात्राओं के भागने के संवेदनशील मामले में तत्कालीन अधीक्षिका सुलोचना बट्टे को निलंबित किया गया था। इस कार्रवाई के बाद व्यवस्था में लीपापोती का दौर ऐसा चला कि विभाग ने नियमों को ताक पर रख दिया। अपनी बहाली के लिए जब निलंबित अधीक्षिका ने हाईकोर्ट की शरण ली, तो न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए साफ तौर पर महज 15 दिनों के भीतर इस पर अंतिम निर्णय लेने का कड़ा निर्देश दिया था। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि अदालत के इस स्पष्ट आदेश को बीते 6 महीने से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है, मगर संभागायुक्त कार्यालय के जिम्मेदार अफसर फाइल पर कुंडली मारकर बैठे हुए हैं। यह सीधे तौर पर न्यायिक आदेशों की अवहेलना और प्रशासनिक हठधर्मिता का जीवंत उदाहरण है, जो यह साबित करता है कि शहडोल संभाग में बैठे अफसरों को अब कानून के डंडे का भी खौफ नहीं रह गया है। प्रशासन की इस घोर लापरवाही और दोहरे मापदंड की कलई तब और खुल जाती है, जब इस पूरे घटनाक्रम के दौरान हुए पक्षपात पर नजर डाली जाती है। सुलोचना बट्टे के निलंबन के बाद विभाग ने आनन-फानन में चंद्रकला को प्रभारी अधीक्षिका की कमान सौंपी थी, जिन्होंने पदभार ग्रहण तक नहीं किया। इसी बीच 8 जनवरी को एक और छात्रा परिसर से भाग निकली, जिसके बाद चंद्रकला को भी निलंबित कर दिया गया था। लेकिन चौंकाने वाला मोड़ यह है कि विभाग ने चंद्रकला को तो कुछ ही समय में बहाल कर दिया, जबकि सुलोचना बट्टे की फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। विभागीय भेदभाव और प्रशासनिक सुस्ती से तंग आकर अब पीड़ित अधीक्षिका ने संभागायुक्त को दोबारा पत्र लिखकर अपनी बहाली की गुहार लगाई है। वहीं दूसरी तरफ, इस पूरे गंभीर मामले में जब संभागायुक्त सुरभि गुप्ता से बात की गई, तो उनका वही पुराना और रटा-रटाया प्रशासनिक जवाब सामने आया कि मामला दिखवाते हैं कि क्या स्थिति है, इसके बाद ही कुछ कहा जा सकेगा।" जिम्मेदार पद पर बैठकर महीनों पुराने हाईकोर्ट के आदेश पर 'मामला दिखवाने' की बात कहना खुद में यह बयां करता है कि संभाग का प्रशासनिक तंत्र आम जनता और कर्मचारियों के हक को लेकर कितना गंभीर और संवेदनशील है।

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