कानून को ठेंगा,शहडोल के मॉल में सरेआम 'तांडव', पुलिस के सामने भी पीटते रहे कर्मचारी; रफा-दफा के खेल पर उठे गंभीर सवाल
Junaid Khan - शहडोल। ऊर्जाधानी और संभागीय मुख्यालय शहडोल में कानून-व्यवस्था की स्थिति किस कदर वेंटिलेटर पर आ चुकी है, इसका एक और शर्मनाक और झकझोर देने वाला नजारा शहर के बीचों-बीच स्थित प्रतिष्ठित व्यावसायिक प्रतिष्ठान 'विनाशकारी लापरवाही' के साए में देखने को मिला। नगर के व्यस्ततम इलाके में स्थित 'विशाल मेगा मार्ट' में बिल के मामूली विवाद को लेकर एक युवती और उसके परिजनों ने जिस तरह सरेआम कानून को अपने हाथ में लिया, उसने न केवल कानून के इकबाल को चुनौती दी है, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की मुस्तैदी की पोल खोलकर रख दी है। सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे एक खौफनाक वीडियो ने शहर की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। इस वायरल वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कैसे एक व्यावसायिक मॉल के भीतर सरेआम मारपीट, गाली-गलौज और अफरा-तफरी का माहौल निर्मित हो गया, जहां न तो आम ग्राहकों की सुरक्षा की कोई गारंटी बची और न ही मॉल प्रबंधन के कर्मचारियों की जान महफूज नजर आई। हैरानी की बात यह है कि इस पूरे हाई-वोल्टेज ड्रामे के दौरान मॉल में मौजूद सैकड़ों ग्राहक अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागते दिखे, जिससे प्रशासनिक दावों की हकीकत सार्वजनिक रूप से बेनकाब हो गई।
खाकी के सामने भी बरसती रहीं लात-घूंसे,आखिर किसका संरक्षण?
इस पूरी घटना का सबसे आपत्तिजनक और प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करने वाला पहलू यह है कि जब मौके पर प्रत्यक्षदर्शियों की सूचना पर कोतवाली पुलिस तमाशबीन बनने के बाद बीच-बचाव करने पहुंची, तब भी हमलावरों के हौसले इस कदर बुलंद थे कि वे पुलिस की मौजूदगी में भी मॉल के मैनेजर और कर्मचारियों पर लगातार हमला करते रहे। वर्दी का खौफ इस कदर गायब हो चुका है कि उपद्रवियों ने खाकी की गरिमा को भी ताक पर रख दिया। सूत्रों की मानें तो उक्त युवती और मॉल प्रबंधन के बीच कुछ दिन पहले भी बिल को लेकर विवाद हुआ था, जिसे पुलिस और रसूखदारों के हस्तक्षेप के बाद सोमवार को थाने में 'लिखित आपसी समझौते' के तहत रफा-दफा कर दिया गया था। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब मामला सुलझ चुका था, तो विगत दिनों युवती दोबारा अपने परिजनों के साथ भारी लाव-लश्कर के साथ मॉल में धावा बोलने किस हैसियत से पहुंची? कोतवाली थाना प्रभारी रावेंद्र तिवारी का यह कहना कि 'दोनों पक्षों में समझौता हो चुका है और फिलहाल किसी की ओर से कार्रवाई की मांग नहीं की गई है', पुलिस प्रशासन की भूमिका को और संदिग्ध बनाता है। क्या शहर के बीचों-बीच सरेआम गुंडागर्दी और शांति भंग करने वाले तत्वों पर पुलिस बिना किसी शिकायत के स्वतः संज्ञान लेकर (Suo Motu) मामला दर्ज नहीं कर सकती थी? इस प्रकार मामलों को ठंडे बस्ते में डालना और समझौते के नाम पर अपराधियों को ढील देना, शहडोल पुलिस की अकर्मण्यता और अपराधियों के प्रति लचर रवैए को साफ दर्शाता है, जो आने वाले समय में किसी बड़ी वारदात को खुली दावत दे रहा है।
