उमस और भीषण गर्मी में तड़पते रहे बेबस मरीज, वेंटिलेटर पर प्रशासनिक सिस्टम
Junaid Khan - शहडोल। करोड़ों रुपये के बजट से चमचमाती इमारतों वाले शहडोल मेडिकल कॉलेज में प्रशासनिक संवेदनहीनता और घोर लापरवाही का एक ऐसा खौफनाक मंजर सामने आया है, जिसने समूचे स्वास्थ्य महकमे की पोल खोलकर रख दी है। अस्पताल परिसर की आंतरिक विद्युत व्यवस्था (इंटरनल पावर सिस्टम) में शनिवार शाम को आए एक तकनीकी फॉल्ट के कारण अस्पताल का आधा हिस्सा अचानक घने अंधकार और भीषण उमस की आगोश में समा गया। बीते 24 घंटे से भी अधिक समय तक अस्पताल के कई महत्वपूर्ण वार्डों में बिजली संकट पसरा रहा, जिसके चलते कूलर और पंखे पूरी तरह शोपीस बने रहे। इस असहनीय उमस और जानलेवा गर्मी के बीच वार्डों में भर्ती गंभीर और वृद्ध मरीज तड़पने को मजबूर हो गए, वहीं उनके परिजन हाथ के पंखों से हवा कर व्यवस्था को कोसते नजर आए। सबसे शर्मनाक पहलू यह रहा कि इतनी बड़ी इमरजेंसी के बावजूद स्थानीय स्तर पर कोई त्वरित बैकअप या ठोस वैकल्पिक इंतजाम नहीं थे। शुरुआती स्तर पर त्वरित कार्रवाई न कर, प्रबंधन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा, जिससे स्थिति बद से बदतर होती चली गई और पूरा अस्पताल प्रशासन एक अदद फॉल्ट के सामने पूरी तरह लाचार और रीढ़विहीन नजर आया। जबलपुर की टीम का इंतजार और दावों की हकीकत; लगातार ट्रिपिंग से बेहाल रहे तीमारदार, कब तय होगी कड़े जिम्मेदारों की जवाबदेही? इस पूरे मामले में मेडिकल कॉलेज प्रबंधन की ढुलमुल कार्यशैली और संकट प्रबंधन की क्षमता पर तीखे सवाल खड़े हो रहे हैं। मामले की गंभीरता को भांपने के बजाय, जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तब जाकर रविवार को जबलपुर से विशेषज्ञ इंजीनियरों की विशेष टीम बुलाई गई। विडंबना देखिए कि दोपहर से लेकर देर शाम तक जबलपुर की यह टीम भी फॉल्ट की सटीक खराबी ढूंढने में नाकामयाब साबित होती रही, जिससे मरीजों की मुसीबतें कई गुना और बढ़ गईं। हालांकि, मेडिकल कॉलेज के अधीक्षक डॉ. नागेन्द्र सिंह का दावा है कि इमरजेंसी सेवाएं सामान्य रूप से संचालित की जा रही थीं और देर शाम इंजीनियरों ने कड़ी मशक्कत के बाद फॉल्ट को ढूंढकर सुधार कार्य पूरा कर बिजली सप्लाई बहाल कर दी है, लेकिन लगातार होती रही ट्रिपिंग ने पूरे दिन मरीज और अस्पताल स्टाफ दोनों को खून के आंसू रुलाए। सवाल यह उठता है कि क्या इतने बड़े संभाग स्तरीय चिकित्सा संस्थान के पास खुद का कोई सक्षम टेक्निकल बैकअप नहीं है, जो एक फॉल्ट सुधारने के लिए चौबीस घंटे तक मरीजों की जान जोखिम में डालकर जबलपुर का रास्ता ताका जाए? इस बड़ी प्रशासनिक लापरवाही ने साबित कर दिया है कि कागजी दावों की जमीनी हकीकत कितनी खोखली है।
