कमता गांव में 03 युवकों की संदिग्ध मौत का मामला गरमाया, सीएम हाउस से लेकर मानवाधिकार आयोग की दहलीज तक गूंजी न्याय की चीक,निष्पक्षता की साख बचाने आईजी ने शहडोल पुलिस से छीनी केस डायरी,उमरिया एसपी को सौंपी कमान
Junaid Khan - शहडोल। जैतपुर कानून व्यवस्था और निष्पक्ष न्याय का दम भरने वाली शहडोल पुलिस की कार्यप्रणाली एक बार फिर गहरे संशय और सवालों के कटघरे में है। जैतपुर थाना क्षेत्र के कमता गांव में बीती 13 और 14 अप्रैल की दरमियानी रात रोहित शर्मा, तनुज शुक्ला और सचिन सिंह नामक तीन होनहार युवकों की कुएं में लाश मिलने के सनसनीखेज मामले को महकमे ने जिस तरह एक 'साधारण सड़क हादसा' बताकर रफा-दफा करने की कोशिश की, उसने पुलिसिया साख को तार-तार कर दिया है। मृतकों के बेबस परिजनों की लगातार उठती चीखों और शिकायतों के बाद आखिरकार प्रशासन को घुटने टेकने पड़े हैं। शहडोल जोन के आईजी ने स्थानीय पुलिस की लचर और संदेहास्पद जांच पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए पूरे मामले की केस डायरी ही जब्त कर ली है। अब इस संवेदनशील 'कमता कांड' की निष्पक्ष व स्वतंत्र जांच का जिम्मा पड़ोसी जिले उमरिया की पुलिस अधीक्षक (एसपी) को सौंप दिया गया है, जो निर्धारित समय सीमा के भीतर सीधे आईजी को अपनी रिपोर्ट सौंपेंगी। लेकिन बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर शहडोल पुलिस किसे बचाने के लिए तथ्यों पर पर्दा डाल रही थी?
हादसा या सुनियोजित मर्डर? शरीर पर गंभीर चोटों के निशान खोल रहे लापरवाही की पोल
स्थानीय जैतपुर पुलिस की शुरुआती जांच में दावा किया गया था कि युवक एक क्षतिग्रस्त कार के साथ कुएं में गिरे और डूबने से उनकी मौत हो गई। परंतु, इस घिसी-पिटी थ्योरी को मृतकों के परिजनों ने सिरे से खारिज करते हुए इसे एक सुनियोजित और बर्बर हत्या करार दिया है। परिजनों का सीधा और गंभीर आरोप है कि तीनों युवकों के शवों पर मिले गहरे और गंभीर चोटों के निशान किसी भी कोण से केवल कुएं में गिरने से नहीं आ सकते। चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब परिजनों ने खुलासा किया कि उन्होंने घटना से जुड़े एक प्रत्यक्षदर्शी और महत्वपूर्ण गवाह की जानकारी स्वयं जैतपुर पुलिस को उपलब्ध कराई थी। लेकिन इंसाफ की डगर पर चलने के बजाय, आरोप है कि स्थानीय पुलिस ने मुख्य गवाह पर ध्यान देने के स्थान पर उल्टा उसे ही कथित रूप से 'गांजा' रखने के झूठे और मनगढ़ंत मामले में फंसाकर जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया। पुलिस की यह कथित और दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई इस बात का पुख्ता इशारा करती है कि घटना से जुड़े अहम सबूतों को नष्ट करने और बड़े चेहरों को अभयदान देने का एक सुनियोजित खेल खेला जा रहा था।
भोपाल तक पहुंची न्याय की गुहार,सीबीआई जांच की उठी मांग
शहडोल पुलिस प्रशासन की इस कथित हठधर्मिता और जांच को प्रभावित करने की कोशिशों से असंतुष्ट पीड़ित परिवारों ने हार नहीं मानी। न्याय की आस में उन्होंने सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएम हाउस), पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष का दरवाजा खटखटाया। लिखित शिकायतों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर हो रही लीपापोती को उजागर करते हुए इस पूरे हत्याकांड की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से उच्च स्तरीय जांच कराने की पुरजोर मांग की गई। भोपाल से जैसे ही इस मामले पर कड़ा संज्ञान लिया गया और पुलिस मुख्यालय ने शहडोल पुलिस से पूरे प्रकरण की रिपोर्ट तलब की, वैसे ही महकमे में हड़कंप मच गया। इसी दबाव और विभाग की बची-कुची निष्पक्षता को प्रदर्शित करने के उद्देश्य से आईजी ने तत्काल प्रभाव से केस को दूसरे जिले में स्थानांतरित करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया।
उमरिया एसपी की एंट्री,नए सिरे से खंगाले जाएंगे सबूत, संदेह के घेरे में खाकी के सिपहसालार
अब इस पूरे बहुचर्चित कांड का दारोमदार उमरिया एसपी के कंधों पर है। उमरिया एसपी के निर्देश पर एसडीओपी पाली ने केस डायरी को अपने कब्जे में लेकर जांच का चक्रव्यूह तैयार कर लिया है। मामले की नए सिरे से दोबारा समीक्षा की जा रही है, जिसमें घटना स्थल से जुड़े वैज्ञानिक साक्ष्य, पोस्टमार्टम रिपोर्ट की फोरेंसिक जांच, और प्रत्यक्षदर्शियों के नए बयान दर्ज किए जाएंगे। आधिकारिक सूत्रों की मानें तो अब तक स्थानीय स्तर पर हुई पूरी जांच का भी बारीकी से परीक्षण किया जाएगा। यदि जांच के किसी भी स्तर पर साक्ष्यों को छिपाने, बदलने या लापरवाही बरतने के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित थाना प्रभारी और जांच अधिकारियों पर भी गाज गिरना तय माना जा रहा है। सवाल अब भी हवा में तैर रहा है क्या नए जिले की पुलिस शहडोल पुलिस के इस रायते को समेट कर पीड़ितों को न्याय दिला पाएगी, या फिर फाइलें बदलने से केवल जांच की दिशा बदलेगी, दशा नहीं?
