साहब' की तानाशाही,चार महीने से बिना सचिव के सुलग रही ग्राम पंचायत,

समस्या लेकर पहुंची महिला सरपंच को जिला पंचायत CEO ने चेंबर में दी गालियां

प्रशासनिक अहंकार चरम पर: IAS शिवम प्रजापति पर अभद्र भाषा के गंभीर आरोप, न्याय की गुहार लेकर कमिश्नर सुरभि गुप्ता की चौखट पर पहुंचीं ग्राम पंचायत बोडरी की पीड़ित सरपंच गनेसिया 


Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और जमीनी स्तर पर चुनी गई व्यवस्था को प्रशासनिक अहंकार किस कदर कुचल रहा है, इसका एक बेहद शर्मनाक और हैरान करने वाला मामला सामने आया है। शहडोल जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) और आईएएस (IAS) अधिकारी शिवम प्रजापति पर अपने ही चेंबर के भीतर एक आदिवासी महिला सरपंच के साथ घोर अभद्र भाषा का प्रयोग करने और गाली-गलौज करने के गंभीर आरोप लगे हैं। मिली जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत बोडरी की सरपंच गनेसिया सोमवार को अपने गांव की एक बेहद जायज और बड़ी समस्या को लेकर जिला मुख्यालय आई थीं। गांव में पिछले चार महीनों से कोई सचिव नहीं है, जिसके कारण पंचायत के तमाम विकास कार्य ठप पड़े हैं और जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए त्राहि-त्राहि कर रही है। जब पीड़ित सरपंच इस घोर प्रशासनिक लापरवाही की शिकायत लेकर सीईओ के चेंबर में दाखिल हुईं, तो साहब अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय इस कदर आगबबूला हो गए कि उन्होंने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दीं। सरपंच के साथ मौजूद प्रत्यक्षदर्शी अनुराग पांडेय ने भी इस बात की पुष्टि की है कि बंद कमरे के भीतर जनप्रतितिधि को अपमानित किया गया, जिससे आहत होकर पीड़ित महिला सरपंच ने अब संभाग के कमिश्नर सुरभि गुप्ता को लिखित शिकायत सौंपकर न्याय की गुहार लगाई है और तीखा सवाल उठाया है कि आखिर एक जिम्मेदार प्रशासनिक पद पर बैठे अफसर ने उनके साथ ऐसी अभद्र भाषा का प्रयोग क्यों और किस अधिकार से किया?

लापरवाही पर पर्दा डालने के लिए उलटा सरपंच पर ही मढ़ दिया दोष; जनता पूछ रही सवाल- क्या यही है सुशासन? 

इस पूरे गंभीर घटनाक्रम के बाद जब प्रशासनिक अमले में हड़कंप मचा, तो अपनी जवाबदेही से बचने और अपनी कमियों को छिपाने के लिए हमेशा की तरह एक रटा-रटाया और संवेदनहीन तर्क सामने आ गया। जिला पंचायत सीईओ शिवम प्रजापति ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए एक ऐसा बयान दिया है जो उनकी कार्यशैली और अहंकार को साफ उजागर करता है। सीईओ का कहना है कि उन्होंने सरपंच से ऐसा कुछ भी नहीं कहा और गांव में सचिव तैनात है। हद तो तब हो गई जब साहब ने उलटा पीड़ित सरपंच पर ही अकर्मण्यता का ठप्पा लगाते हुए कह दिया कि "अगर सरपंच को सचिव से काम लेना नहीं आ रहा है, तो हम क्या कर सकते हैं।" यह बयान सीधे तौर पर मैदानी हकीकत से आंखें मूड़ने और एक जनप्रतिनिधि की प्रशासनिक क्षमता का सरेआम मजाक उड़ाने जैसा है। यदि गांव में सब कुछ ठीक था और सचिव काम कर रहा था, तो चार महीने से जनता परेशान क्यों है और एक महिला सरपंच को कमिश्नर तक दौड़ लगाने की नौबत क्यों आई? यह मामला सिर्फ एक गाली-गलौज का नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर बेलगाम हो चुकी नौकरशाही द्वारा ग्रामीण विकास को बंधक बनाने और जमीनी लोकतंत्र को चुनौती देने का है। अब देखना यह है कि कमिश्नर सुरभि गुप्ता इस गंभीर शिकायत पर क्या कड़ा संज्ञान लेती हैं या फिर आईएएस लॉबी की इस घोर लापरवाही और बदतमीजी की फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।

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