रेलवे की कातिलाना लापरवाही,जर्जर दीवार ढहने से मलबे में दबे छह मासूम, तीन जिंदगी और मौत के बीच

हादसे के बाद साक्ष्य मिटाने में जुटा महकमा! खून से सनी मिट्टी पर आनन-फानन में चलवा दी जेसीबी,दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के इंजीनियरिंग विभाग (IOW) की भूमिका पर गंभीर सवाल, आक्रोशित शहर पूछ रहा,इन बच्चों का गुनहगार कौन? 



Junaid Khan - शहडोल। शहडोल के रेलवे इंस्टीट्यूट परिसर में रविवार की सुबह 10 से 12 बजे के बीच जो कुछ भी हुआ, वह महज़ एक हादसा नहीं बल्कि रेलवे प्रशासन और उसके बेपरवाह इंजीनियरिंग विभाग द्वारा प्रायोजित एक प्रशासनिक अपराध है। बरसों से जर्जर और बिना किसी तकनीकी मापदंड के खड़ी मौत की एक दीवार आखिरकार भरभराकर उन मासूमों पर जमींदोज हो गई, जो वहां अपने बचपन के अधिकार खेलने' के लिए जुटे थे। खेल-खेल में जब गेंद बाउंड्री के पास गई, तो उसे उठाने की कोशिश में वर्षों पुरानी खोखली दीवार बच्चों पर काल बनकर टूट पड़ी। इस हृदयविदारक घटना में छह बच्चे मलबे की चपेट में आ गए, जिनमें से तीन की हालत अत्यंत नाजुक बनी हुई है। किसी का हाथ फ्रैक्चर है, किसी का पैर कुचल गया है, तो किसी के सिर में गहरे टांके यह गवाही दे रहे हैं कि रेलवे की लापरवाही का घाव कितना गहरा है। सभी लहूलुहान बच्चों को तत्काल शहर के निजी आदित्य अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां डॉक्टर उनकी सांसों को बचाने की जंग लड़ रहे हैं, लेकिन इस बीच रेलवे का संवेदनहीन चेहरा एक बार फिर बेनकाब हो गया है।

खून के धब्बे सूखने से पहले साक्ष्य मिटाने की जल्दबाजी क्यों? उठ रहे गंभीर सवाल

घटना के बाद रेलवे महकमे ने जो तत्परता घायल बच्चों को बचाने या उनके परिजनों को ढांढस बंधाने में नहीं दिखाई, उससे कहीं ज्यादा हड़बड़ी उसने अपनी गर्दन बचाने में दिखाई। चश्मदीदों और स्थानीय नागरिकों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि हादसे के कुछ ही देर बाद, बिना किसी निष्पक्ष फॉरेंसिक या तकनीकी जांच के, मौके पर दनादन जेसीबी मशीनें उतार दी गईं। आनन-फानन में उस गिरे हुए मलबे और ढही हुई दीवार के अवशेषों को वहां से साफ करा दिया गया। सवाल यह उठता है कि आखिर रेलवे प्रशासन को किस बात का डर था? क्या यह हड़बड़ी उस घटिया निर्माण कार्य के तकनीकी साक्ष्यों को छुपाने के लिए थी, जिसमें न तो मजबूत कॉलम थे, न बीम और न ही सुरक्षा के लिहाज से पर्याप्त सरिया (स्टील रॉड) का इस्तेमाल किया गया था? प्रथम दृष्टया यह साफ है कि भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण को दफन करने के लिए ही रविवार के दिन भी रेलवे की जेसीबी इतनी मुस्तैदी से चली।

सीनियर सेक्शन इंजीनियर (IOW) की भूमिका संदिग्ध, क्या फाइलों में ही हो रहा था मेंटेनेंस? 

इस पूरे घटनाक्रम ने रेलवे के इंजीनियरिंग विभाग, जिसे स्थानीय स्तर पर आईओडब्ल्यू (IOW) शाखा कहा जाता है, को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया है। विभाग के वरिष्ठ अनुभाग अभियंता (Senior Section Engineer) अरविंद कुमार और उनकी पूरी टीम की कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठ रही हैं। नियमानुसार रेलवे परिसरों और उसकी पुरानी संपत्तियों का समय-समय पर तकनीकी निरीक्षण, फिटनेस ऑडिट और रखरखाव करने का जिम्मा इसी विभाग का है। जनता अब यह पूछ रही है कि इस कातिल दीवार का अंतिम बार तकनीकी मुआयना कब किया गया था? क्या कागजों पर ही मेंटेनेंस की इतिश्री कर ली गई थी? यदि यह दीवार जर्जर घोषित थी, तो इसे गिराया क्यों नहीं गया, और यदि इसे सुरक्षित माना गया था, तो इसके भरभराकर गिरने की जिम्मेदारी लेते हुए अब तक संबंधित अधिकारियों पर निलंबन या एफआईआर (FIR) जैसी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

मौत के मुहाने पर खड़ा है पूरा इंस्टीट्यूट,बड़े हादसे का इंतजार कर रहे अफसर 

यह खौफनाक हादसा तो सिर्फ एक बानगी है, हकीकत यह है कि पूरा रेलवे इंस्टीट्यूट परिसर ही इस समय एक बड़े टाइम बम पर बैठा है। इसी परिसर में स्थित विशाल सभागार की छत और उसकी पीछे की दीवारें लंबे समय से मौत को आमंत्रण दे रही हैं। हद तो यह है कि भवन के पिछले हिस्से को गिरने से बचाने के लिए वहां लोहे की भारी-भरकम प्लेटें लगाकर उसे जुगाड़ के सहारे खड़ा किया गया है। इसी बदहाल और खतरनाक हो चुके सभागार में रेलवे के अपने विभागीय कार्यक्रम, बड़े सांस्कृतिक आयोजन और हर साल भव्य दुर्गा उत्सव जैसे मजमे जुटते हैं, जहां हजारों की तादाद में आम नागरिक और रेलकर्मी शामिल होते हैं। स्थानीय नागरिकों ने चेतावनी दी है कि यदि इस पूरे परिसर का तत्काल स्ट्रक्चरल ऑडिट कराकर इसकी मुकम्मल मरम्मत नहीं कराई गई, तो भविष्य में सैकड़ों तमाशबीनों की जान एक झटके में जा सकती है।

सुरक्षा के दावों के बीच फैला नशे का जाल, परिसर में बिखरी मिलीं सिरिंज और शराब की बोतलें 

रेलवे प्रशासन की नाकामी का दायरा सिर्फ जर्जर दीवारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह परिसर सुरक्षा और मॉनिटरिंग के मोर्चे पर भी पूरी तरह खोखला साबित हुआ है। मौके पर पहुंचे आक्रोशित लोगों ने प्रशासनिक अधिकारियों को दिखाया कि किस तरह इस पूरे इंस्टीट्यूट ग्राउंड और उसके आसपास शराब की खाली बोतलें, प्रतिबंधित इंजेक्शन और नशीली सिरिंजों का अंबार लगा हुआ है। दिन ढलते ही यह परिसर असामाजिक तत्वों और नशेड़ियों का अड्डा बन जाता है। रेलवे सुरक्षा बल (RPF) और स्थानीय प्रबंधन की नाक के नीचे चल रहे इस अनैतिक खेल के कारण यहां बच्चों का आना-जाना पहले ही असुरक्षित था, और अब इस व्यवस्थागत नाकामी ने बच्चों के खून से अपनी जमीन सींच ली है।

प्रशासनिक अमला सक्रिय, एसडीएम अमृता गर्ग ने संभाला मोर्चा,अब निष्पक्ष जांच की चुनौती 

घटना की भयावहता को देखते हुए सोहागपुर की अनुविभागीय दंडाधिकारी (एसडीएम) श्रीमती अमृता गर्ग तत्काल अपने दल-बल के साथ ग्राउंड जीरो पर पहुंचीं। उन्होंने न सिर्फ घटना स्थल का बारीकी से निरीक्षण किया, बल्कि मलबे के चश्मदीद बच्चों और स्थानीय निवासियों से भी सीधे संवाद कर उनका बयान दर्ज किया। एसडीएम ने बच्चों को फिलहाल इस खतरनाक जोन से दूर रहने और सुरक्षित स्थानों पर खेलने की समझाइश दी है। नागरिक प्रशासन की इस सक्रियता के बाद अब गेंद पूरी तरह से रेलवे के पाले में है। पूरा शहडोल शहर इस समय स्तब्ध और आक्रोशित है। देखना यह है कि क्या हमेशा की तरह इस बार भी इस गंभीर लापरवाही को विभागीय फाइलों और लीपापोती के मलबे में दबा दिया जाएगा, या फिर मासूमों को न्याय देते हुए उन सफेदपोश जिम्मेदार अफसरों को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाएगा जिनकी लापरवाही ने तीन परिवारों के चिरागों को अस्पताल के आईसीयू (ICU) में धकेल दिया है।

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