अव्यवस्था का 'पासपोर्ट' सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल घंटों लाइन में खड़े रहने को मजबूर दूर-दराज से आए आवेदक

ऑनलाइन अपॉइंटमेंट के बाद भी 3 से 4 घंटे का इंतजार, आखिर जिम्मेदार मौन क्यों?


Junaid Khan - शहडोल। स्थानीय पासपोर्ट कार्यालय इन दिनों डिजिटल इंडिया के दावों को ठेंगा दिखाते हुए घोर प्रशासनिक लापरवाही और कछुआ गति कार्यप्रणाली का अड्डा बन चुका है। मंगलवार को कार्यालय की लचर व्यवस्था उस समय एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई, जब सुबह 11 बजे का ऑनलाइन अपॉइंटमेंट लेकर पहुंचे दर्जनों आवेदकों को तीन से चार घंटे तक कड़ी धूप और अव्यवस्था के बीच इंतजार करने पर मजबूर होना पड़ा। विडंबना देखिए कि डिजिटल युग में समय की बचत के लिए शुरू की गई ऑनलाइन अपॉइंटमेंट प्रक्रिया यहाँ आकर पूरी तरह बेअसर साबित हो रही है। अनूपपुर, उमरिया, कटनी, पाली और यहाँ तक कि जबलपुर जैसे दूर-दराज के इलाकों से सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर पहुंचे नागरिकों का काम समय पर पूरा होना तो दूर, उन्हें दफ्तर के बाबुओं की बेरुखी का सामना करना पड़ रहा है। सबसे शर्मनाक स्थिति महिलाओं, बुजुर्गों और दुधमुंहे बच्चों के साथ आई महिला आवेदकों की रही, जिन्हें बुनियादी सुविधाओं के अभाव में घंटों लाइन में खड़े रहकर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी।

अप्रशिक्षित स्टाफ और जिम्मेदारों की लापरवाही ने बिगाड़ा खेल,जनता पूछ रही- कब सुधरेगा ढर्रा?

प्रशासनिक अमले को सीधी चुनौती देती इस अव्यवस्था पर आक्रोशित आवेदकों ने साफ तौर पर आरोप लगाया है कि शहडोल पासपोर्ट कार्यालय में कार्य की गति बेहद धीमी और गैर-जिम्मेदाराना है। जब शासन-प्रशासन द्वारा बकायदा फीस लेकर एक निश्चित समय का अपॉइंटमेंट अलॉट किया जाता है, तो तय समय सीमा के भीतर काम न होना सीधे तौर पर जनता के अधिकारों का हनन और प्रशासनिक विफलता है। धरातल पर तफ्तीश करने पर यह बात सामने आई है कि कार्यालय में न तो पर्याप्त स्टाफ की तैनाती है और न ही ऑपरेटरों को आधुनिक सॉफ्टवेयर चलाने का उचित प्रशिक्षण दिया गया है। स्टाफ की भारी कमी और अप्रशिक्षित कंप्यूटर ऑपरेटरों के भरोसे चल रहे इस संवेदनशील दफ्तर के कारण लंबी-लंबी कतारें आम बात हो चुकी हैं। क्षेत्र की जनता अब सीधे उच्चाधिकारियों से सवाल कर रही है कि जब तक पर्याप्त स्टाफ और कुशल ऑपरेटरों की स्थाई तैनाती नहीं होती, तब तक आम नागरिकों को इस मानसिक प्रताड़ना से मुक्ति कैसे मिलेगी? यदि समय रहते इस व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया, तो यह सुलगता आक्रोश किसी बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है।

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