निजी अस्पतालों में अप्रशिक्षित छात्राओं के भरोसे ICU और ऑपरेशन थिएटर,बिना रजिस्ट्रेशन और क्लीनिकल ट्रेनिंग के धड़ल्ले से चल रहा 'जानलेवा खेल'
Junaid Khan - शहडोल। क्षेत्र के निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर मरीजों की जान से खिलवाड़ करने का एक ऐसा खौफनाक रैकेट सामने आया है, जिसने समूचे प्रशासनिक और स्वास्थ्य अमले की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। स्थानीय निवासी प्रदीप शुक्ला द्वारा क्षेत्रीय स्वास्थ्य संचालक रीवा को लिखे गए एक शिकायती पत्र के बाद इस पूरे काले कारनामे का भंडाफोड़ हुआ है। शिकायत में सनसनीखेज दावा किया गया है कि शहर के अधिकांश निजी अस्पतालों में कार्यरत लगभग 80 प्रतिशत नर्सिंग स्टाफ पूरी तरह अप्रशिक्षित है। ये कोई पेशेवर नर्स नहीं, बल्कि स्थानीय नर्सिंग कॉलेजों में प्रथम, द्वितीय या तृतीय वर्ष में पढ़ने वाली छात्राएं हैं, जो अपनी पढ़ाई के साथ-साथ पार्ट-टाइम के रूप में इन अस्पतालों में सेवाएं दे रही हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इन छात्राओं के पास न तो नर्सिंग का कोई वैध पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) है और न ही इनकी क्लीनिकल ट्रेनिंग पूरी हुई है। इसके बावजूद अस्पताल संचालक कानून को ठेंगा दिखाकर महज कुछ हजार रुपये की मामूली सैलरी पर इन्हें नर्स की वर्दी पहनाकर गंभीर मरीजों की देखरेख में लगा रहे हैं।
ICU से लेकर ऑपरेशन थिएटर तक फैला जाल, प्रशासन को खुली चुनौती
यह महज एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सीधे तौर पर एक संगीन आपराधिक कृत्य है, जो जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे धड़ल्ले से फल-फूल रहा है। चंद रुपयों का लालच देकर ये निजी अस्पताल संचालक इन अप्रशिक्षित छात्राओं से मरीजों को गंभीर इंजेक्शन लगाने, ड्रिप चढ़ाने और मरहम-पट्टी करने जैसे काम तो करा ही रहे हैं, साथ ही इन्हें ICU (इंटेन्सिव केयर यूनिट) और ऑपरेशन थिएटर (OT) जैसे अति-संवेदनशील विभागों में भी तैनात कर दिया गया है। जहां एक छोटी सी चूक मरीज की जान ले सकती है, वहां इन नौसिखियों के हाथों में मरीजों की जिंदगी सौंप देना सीधे तौर पर मौत को दावत देने जैसा है। शिकायतकर्ता ने इसे घोर लापरवाही और मरीजों के साथ धोखाधड़ी बताते हुए संबंधित उच्च अधिकारियों से मांग की है कि इन निजी अस्पतालों का तत्काल औचक निरीक्षण किया जाए और दोषियों के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं के तहत मामला दर्ज कर अस्पतालों के लाइसेंस निरस्त किए जाएं। अब देखना यह है कि कुंभकर्णी नींद में सोया प्रशासनिक अमला इस खुली चुनौती के बाद जागता है या फिर किसी बड़े हादसे का इंतजार करता है।
गोपनीयता का संकल्प,सीक्रेट ऑपरेशन के तहत बेनकाब होंगे गुनहगार
संपादकीय नोट: इस पूरे मामले की संवेदनशीलता और गंभीरता को देखते हुए समाचार पत्र ने अपनी इस खोजी रिपोर्ट में उन अस्पतालों और वहां कार्यरत छात्राओं/नर्सों के नामों का खुलासा जानबूझकर नहीं किया है। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि खबर छपने के बाद ये शातिर अस्पताल संचालक और लापरवाह स्टाफ पहले से सतर्क न हो सकें और न ही इन्हें साक्ष्य मिटाने या लीपापोती करने का कोई मौका मिले। इस पूरी धांधली को जड़ से उखाड़ने के लिए एक 'सीक्रेट ऑपरेशन' के तहत विभाग के उच्च अधिकारियों द्वारा इसकी जमीनी स्तर पर औचक व गोपनीय जांच कराई जानी बेहद जरूरी है, ताकि दोषियों को उनके किए की सख्त से सख्त सजा मिल सके और जनता का भरोसा स्वास्थ्य व्यवस्था पर बना रहे।
