पूर्व एसपी के दौर से नवागत पुलिस कप्तान तक सिंडिकेट पर मेहरबानी,तार और सरकारी संपत्ति गायब, महकमा मौन
Junaid Khan - शहडोल। जिले में कबाड़ माफिया और पुलिसिया संरक्षण का कॉकटेल इस कदर हावी हो चुका है कि कानून-व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित होकर रह गई है। बुढार और केशावाही अंचल से लेकर पूरे शहडोल संभाग में बिजली के तार, सरकारी मशीनरी, एसईसीएल (SECL) के कबाड़ और रेलवे संपत्ति की धड़ल्ले से कटाई और चोरी जारी है। ताज्जुब की बात यह है कि तत्कालीन पुलिस अधीक्षक रामजी श्रीवास्तव के पूरे कार्यकाल के दौरान कबाड़ सिंडिकेट के सरगनाओं पर एक भी बड़ी कार्रवाई नहीं हुई। तत्कालीन एसपी के जाने के बाद नवागत पुलिस अधीक्षक डॉ. संजय कुमार अग्रवाल के पदभार संभालने पर जनता और मीडिया को सख्त कार्रवाई की उम्मीद थी, लेकिन हफ्तों बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। कबाड़ के बड़े गोदामों पर न तो छापेमारी की जा रही है और न ही अवैध माल खपाने वाले सरगनाओं की नकेल कसी जा रही है।
केशावाही और कोठी में 20 पोल से तार पार, महीनों से अंधेरे में ग्रामीण
पुलिस की सुस्ती का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। जैतपुर विधानसभा और बुढार जनपद के ग्राम पंचायत कोठी, छिरईपानी और आसपास के इलाकों में 20 से अधिक पोलों से तांबे और एल्युमिनियम के तार काटकर चोरी कर लिए गए हैं। लगातार हो रही चोरियों के कारण 5 से अधिक गांवों के दर्जनों घर पिछले एक महीने से अंधेरे में डूबे हैं। केशावाही चौकी और बुढार थाना पुलिस की निष्क्रियता का आलम यह है कि 20 जून को 5 खंभों से तार चोरी होने के बाद भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, जिसके चलते हौसला बुलंद चोरों ने 10 जुलाई को फिर 15 खंभों से तार पार कर दिए। पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने के नाम पर महज औपचारिकता निभाई और पावती थमा दी। भीषण बारिश के मौसम में ग्रामीण अंधेरे में विषैले जीव-जंतुओं के खौफ के बीच जीने को मजबूर हैं। तंग आकर आक्रोशित ग्रामीणों को 80 किलोमीटर का लंबा सफर तय कर कलेक्ट्रेट का घेराव करने पर मजबूर होना पड़ा।
सिंडिकेट के इशारे पर हो रही सरकारी और रेल संपत्ति की लूट
सूत्रों और स्थानीय जानकारियों के मुताबिक, जिले में कबाड़ का साम्राज्य गुड्डू और अनीस जैसे कबाड़ माफियाओं के इशारे पर संचालित हो रहा है। शहर से लेकर अंचलों तक फल-फूल रहे अवैध कबाड़खानों और गोदामों में चोरी की संपत्तियों को ठिकाने लगाया जा रहा है। गिरोह के सरगना शहर के सीधे-साधे और बेरोजगार युवाओं को इस गैर-कानूनी दलदल में धकेल कर रातों-रात बिजली के तार, एसईसीएल के लोहे के उपकरण और रेलवे का माल कटवा रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि आरपीएफ और स्थानीय रेल पुलिस भी इस पूरे नेटवर्क से अनजान बनी बैठी है। जगह-जगह बने विशाल गोदामों की न तो कोई तलाशी ली जा रही है और न ही उनकी जांच की हिम्मत उठाई जा रही है।
अवधेश गोस्वामी के कार्यकाल के बाद क्यों छाया सन्नाटा?
अंचल की जनता भली-भांति याद करती है कि जब लगभग 3 साल पहले तत्कालीन एसपी अवधेश गोस्वामी ने कमान संभाली थी, तब उन्होंने कबाड़, कोयला और रेत माफियाओं पर ताबड़तोड़ छापेमारी कर सिंडिकेट की कमर तोड़ दी थी। हालांकि, उनके जाते ही पुलिसिया रुख ऐसा बदला कि माफियाओं को खुली छूट मिल गई। सोशल मीडिया, ट्वीट, फेसबुक पोस्ट और समाचार पत्रों के माध्यम से मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, मध्य प्रदेश पुलिस महानिदेशक (DGP) और गृह विभाग के आला अधिकारियों तक लगातार गुहार लगाई गई, लेकिन स्थानीय पुलिस और प्रशासनिक अमले की चुप्पी टूटने का नाम नहीं ले रही है।
एसपी और आईजी कार्यालय की चौखट पर सवाल,आखिर कब जागेगा प्रशासन?
जिला मुख्यालय में पुलिस अधीक्षक कार्यालय से लेकर आईजी मैडम के संभाग स्तर के कार्यालय मौजूद हैं, फिर भी कबाड़ सिंडिकेट के इस गठजोड़ पर किसी की नजर न पड़ना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। सम्मानित पदों पर बैठे पुलिस अधिकारियों की इस चुप्पी से आम जनता के मन में यह सवाल कौंध रहा है कि आखिर क्या वजह है कि इन कबाड़ियों के ठिकानों पर हाथ डालने से पुलिस कतरा रही है? यदि जल्द ही अवैध गोदामों की जांच, कबाड़ माफियाओं की गिरफ्तारी और चोरी गए तारों की बरामदगी कर बिजली आपूर्ति बहाल नहीं की गई, तो जनाक्रोश उग्र आंदोलन का रूप ले सकता है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन और पुलिस महकमे की होगी।
