संवेदनहीनता का 'मेडिकल मॉडल,जांच के नाम पर तड़प रहे मरीज

करोड़ों का बजट हजम, फिर भी एक मशीन के भरोसे चल रहा भगवान भरोसा अस्पताल 


Junaid Khan - शहडोल। शासकीय बिरसा मुंडा चिकित्सा महाविद्यालय (मेडिकल कॉलेज) में बदहाली और प्रशासनिक घोर लापरवाही का नंगा नाच जारी है। स्वास्थ्य सेवाओं को चुस्त-दुरुस्त करने के लंबे-चौड़े सरकारी दावों के बीच अस्पताल प्रबंधन की लचर कार्यशैली से हर रोज सैकड़ों गरीब और गंभीर मरीज पिस रहे हैं। परिसर में एक्स-रे और पैथोलॉजी जांच के नाम पर जो व्यवस्था बनाई गई है, वह राहत देने के बजाय मरीजों के लिए किसी मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से कम नहीं है। विडंबना यह है कि तीन-तीन कमरे बने होने के बावजूद महज एक कक्ष में एक ही मशीन से एक्स-रे किया जा रहा है। घंटों लाइन में खड़े रहने के कारण गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों, खासकर बुजुर्गों और दिव्यांगों का दर्द दोगुना हो जाता है। बैठने के लिए कुर्सियां तक उपलब्ध नहीं हैं, जिससे मजबूरन मरीज जमीन पर बैठने या पसीने से तरबतर होने को विवश हैं। जिम्मेदारों की यह चुप्पी सीधे तौर पर उस सरकारी तंत्र को चुनौती दे रही है जो बजट के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रहा है।

समय पर रिपोर्ट नहीं, ओपीडी बंद होने के बाद भटक रहे ग्रामीण

सिर्फ जांच के लिए इंतजार ही समस्या नहीं है, बल्कि रिपोर्ट मिलने में होने वाली देरी ने व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। एक्स-रे कराने के बाद रिपोर्ट हासिल करने के लिए मरीजों को 2 से 3 घंटे अतिरिक्त कतार में खड़ा रहना पड़ता है। इस पूरी कछुआ चाल की वजह से दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से किराए का भाड़ा लगाकर आए गरीब मरीज जब तक रिपोर्ट लेकर लौटते हैं, तब तक ओपीडी में डॉक्टरों के बैठने का समय समाप्त हो जाता है। इसके चलते सैकड़ों किलोमीटर दूर से आने वाले असहाय लोगों को बिना इलाज कराए ही खाली हाथ या प्राइवेट क्लिनिकों की शरण में जाना पड़ रहा है। पैथोलॉजी विभाग का आलम यह है कि वहां रजिस्ट्रेशन के लिए पर्याप्त कंप्यूटर तक मौजूद नहीं हैं, जिसके कारण सैंपल देने से पहले ही मरीज और उनके अटेंडेंट एक-एक घंटे तक लाइन में धक्के खाने को मजबूर हैं।

करोड़ों के संसाधन धरे के धरे, परिसर में फल-फूल रहा प्राइवेट कमीशन का खेल 

अस्पताल प्रशासन की सबसे बड़ी नाकामी यह है कि पैथोलॉजी जांचों के लिए भारी-भरकम बजट और आधुनिक उपकरण होने का दावा तो किया जाता है, लेकिन धरातल पर गंभीर जांचें पूरी तरह ठप पड़ी हैं। उदाहरण के तौर पर डी-डाइमर (D-Dimer) जैसी महत्वपूर्ण जांचें तक मेडिकल कॉलेज में उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं और मरीजों को मजबूरन बाहर की महंगी लैब में जाना पड़ रहा है। सूत्रों के मुताबिक, अस्पताल परिसर के भीतर दलालों और प्राइवेट पैथोलॉजी लैब के एजेंटों का बाकायदा एक संगठित सिंडिकेट सक्रिय है, जो प्रशासनिक शह पर बेधड़क घूमकर मरीजों को डराता और लूटता है। यह सीधे तौर पर मेडिकल कॉलेज के अधिकारियों की मिलीभगत और अकर्मण्यता की तरफ इशारा करता है। अगर समय रहते एक्स-रे और पैथोलॉजी की रिपोर्ट आधे घंटे में उपलब्ध कराने की ठोस व्यवस्था नहीं बनाई गई और इन बिचौलियों पर शिकंजा नहीं कसा गया, तो आने वाले दिनों में यह जन-आक्रोश उग्र रूप धारण कर सकता है।

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