क्या सिर्फ नोटिस जारी करने से मिट जाएगा 75 हजार से अधिक का गबन? जांच अटकी तो उजागर होंगे बड़े प्रशासनिक चेहरे
Junaid Khan - शहडोल। शहडोल नगर पालिका अब पारदर्शी व्यवस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और अराजकता का नया अड्डा बनती जा रही है। आम नागरिकों की गाढ़ी कमाई और खून-पसीने से चुकाए गए टैक्स के पैसे को नगर पालिका के ही कुछ जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी डकारने में लगे हैं। मामला केवल कुछ हजार रुपयों का नहीं, बल्कि तंत्र की उस सोच का है जहां जनता का पैसा सरकारी खाते में न जाकर कर्मचारियों की निजी जेबों की शोभा बढ़ा रहा है। नगर पालिका परिसर में लगातार उजागर हो रहे भ्रष्टाचार के नए-नए कारनामों ने अब प्रशासनिक कार्यप्रणाली और वरिष्ठ अधिकारियों की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ताजा मामला उस वक्त उजागर हुआ जब कैशियर का कार्यभार संभाल रहे सहायक ग्रेड-3 के एक कर्मचारी द्वारा नागरिकों द्वारा जमा कराए गए ₹75,708 की राशि को नगर पालिका के अधिकृत खाते में जमा करने के बजाय सीधे अपनी जेब में धर लिया गया। यह सीधी सीनाजोरी है कि जनता रसीद लेकर यह समझती रही कि उनका टैक्स जमा हो गया, जबकि नगर पालिका के भीतर ही उस रकम की बंदरबांट की जा चुकी थी। इस पूरे गोरखधंधे पर पर्दा डालने की कोशिशें तब उजागर हुईं जब पूर्व सीएमओ आशा भंडारी ने 22 मई को संबंधित कर्मचारी को कारण बताओ नोटिस जारी कर तत्काल पूरी राशि नगर पालिका के खाते में जमा कराने का कड़ा निर्देश दिया था।
कैशबुक गायब,जांच से भाग रहे कसूरवार,क्या बड़े आकाओं का है संरक्षण?
हैरानी और घोर लापरवाही की इंतहा तो तब देखने को मिली जब नोटिस जारी होने के बाद कैशियर का प्रभार दूसरे कर्मचारी श्रवण कुमार को सौंपा गया। प्रभार हस्तांतरण की प्रक्रिया के दौरान संबंधित दागी कर्मचारी ने कैशबुक ही उपलब्ध नहीं कराई। सवाल यह उठता है कि क्या नगर पालिका प्रशासन में उच्चाधिकारियों का खौफ पूरी तरह खत्म हो चुका है? किसी अदना कर्मचारी की यह मजाल कैसे हुई कि वह सरकारी रिकॉर्ड और कैशबुक दबाकर बैठ जाए? सूत्रों का स्पष्ट दावा है कि अगर पूरे मामले की निष्पक्ष और निष्पक्ष जांच (कैशबुक स्क्रूटनी) कराई जाए, तो केवल यह ₹75,708 का मामला तो महज एक बानगी (सिर्फ ट्रैलर) साबित होगा। इसके पीछे लाखों-करोड़ों के बड़े वित्तीय घोटाले और कई सफेदपोशों की गर्दनें नापने की पूरी गुंजाइश है। प्रशासन की यह ढिलाई साबित करती है कि व्यवस्था कसूरवारों पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें बचाने के जतन में जुटी है।
