लाखों गँवाने के बाद भी न्याय के लिए भटक रहे पीड़ित, आखिर कब जागेगा प्रशासन?
Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश में साइबर अपराधों का ग्राफ जिस तेजी से बढ़ रहा है, उसने पुलिस और प्रशासन के दावों की पोल खोलकर रख दी है। ताजा मामला शहडोल जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र से सामने आया है, जहाँ एक सेवानिवृत्त फौजी साइबर ठगों की शातिराना साजिश का शिकार हो गए। अपनी जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई से 9,91,000 रुपये गंवाने के बाद पीड़ित जब न्याय की गुहार लगाने साइबर सेल और थाने पहुँचे, तो उन्हें सिर्फ तारीखें और आश्वासन ही मिले। यह घटना केवल एक रिटायर्ड सैनिक के साथ हुई धोखाधड़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस प्रशासनिक और पुलिसिया लापरवाही को भी उजागर करती है जिसके चलते अपराधी बेखौफ होकर डिजिटल डकैती को अंजाम दे रहे हैं।
व्हाट्सऐप ऐप के झांसे में गंवाए 9.91 लाख, ऊपर से मिली जान से मारने की धमकी
मामले का विवरण देते हुए पीड़ित जगदीश प्रसाद पटेल (62 वर्ष), निवासी वार्ड क्र. 16 पटेल नगर शहडोल ने बताया कि वे 2011 में थल सेना से सेवानिवृत्त हुए थे। उनके एक साथी के सुझाव पर उन्होंने शेयर मार्केट में निवेश के उद्देश्य से व्हाट्सऐप के जरिए एक अनुशंसित ऐप इंस्टॉल किया था। ऐप में शुरुआती दौर में मुनाफा दिखाकर उनका विश्वास जीता गया। इसके बाद विभिन्न किश्तों में करूर वैश्य बैंक और आईडीबीआई बैंक की शाखाओं के खातों में कुल 9,91,000 रुपये ट्रांसफ़र करवा लिए गए। ऐप की स्क्रीन पर उनका कुल बैलेंस 16,80,549 रुपये दिखाया जा रहा था, लेकिन जब उन्होंने इस राशि का आहरण (विड्रॉल) करना चाहा, तो पूरी व्यवस्था ठप हो गई। ठगी का अहसास होने पर जब पीड़ित ने दिए गए नंबर पर संपर्क किया, तो आरोपी ने उल्टे 1,00,000 रुपये अतिरिक्त जमा करने का दबाव बनाया और ऐसा न करने पर जमा राशि डुबोने की धमकी दी।
कानूनी खानापूर्ति और जांच की धीमी चाल पर उठते सवाल
हैरानी की बात यह है कि घटना की शिकायत साइबर सेल में करने और कोतवाली थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4), 319(2) एवं 308 के तहत मामला दर्ज होने के बावजूद, जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई का अभाव दिख रहा है। पीड़ित सैनिक का कहना है कि उन्होंने देश की रक्षा में अपनी जिंदगी लगाई, लेकिन आज अपने ही देश में साइबर अपराधियों के आगे लाचार महसूस कर रहे हैं। साइबर अपराधों से निपटने के लिए सरकार और पुलिस प्रशासन द्वारा बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, परंतु जब किसी आम नागरिक या पूर्व सैनिक के साथ धोखाधड़ी होती है, तो तकनीकी जांच के नाम पर महीनों फाइलें एक मेज से दूसरी मेज घूमती रहती हैं।
लापरवाह अधिकारियों और साइबर सुरक्षा तंत्र पर जनता का आक्रोश
इस पूरे घटनाक्रम से स्थानीय जनता में भारी रोष है। लोगों का कहना है कि यदि त्वरित आधार पर बैंक खातों को फ्रीज करने और संदिग्ध मोबाइल नंबरों को ट्रेस करने का काम किया जाता, तो पीड़ित की गाढ़ी कमाई बच सकती थी। क्या मध्य प्रदेश का साइबर सेल केवल जागरुकता के पोस्टर छापने तक सीमित रह गया है? जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों की यह ढिलाई और सुस्त रवैया ही फर्जीवाड़ा करने वाले गिरोहों के हौसले बुलंद कर रहा है। यदि जल्द ही इस मामले में संलिप्त अपराधियों की गिरफ्तारी नहीं हुई और पीड़ित का पैसा वापस नहीं मिला, तो क्षेत्र की जनता और पूर्व सैनिक संगठन प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोलने को मजबूर होंगे।
