ड्यूटी के दौरान आग्नेयास्त्र चलाने पर नहीं दर्ज होगा सीधा अपराध,न्यायिक जांच के बाद ही होगी कार्रवाई, शासन के ऐतिहासिक फैसले से बढ़ा वनकर्मियों का मनोबल
Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश शासन ने प्रदेश के वन और वन्यजीवों की रक्षा में दिन-रात अपनी जान जोखिम में डालने वाले वन रक्षकों व विभागीय अधिकारियों के हित में एक अत्यंत ऐतिहासिक और साहसिक निर्णय लिया है। राज्य सरकार द्वारा 7 अगस्त को जारी राजपत्र अधिसूचना के अनुसार, अब कर्तव्य पालन के दौरान आग्नेयास्त्र (हथियार) का प्रयोग करने वाले वन अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ बिना पूर्व प्रशासनिक स्वीकृति के सीधे तौर पर कोई भी आपराधिक प्रकरण या एफआईआर (FIR) दर्ज नहीं की जा सकेगी। सरकार और उच्चाधिकारियों का स्पष्ट मानना है कि जंगलों में मुस्तैद वनकर्मियों पर अक्सर अनावश्यक दबाव बनाने या दुर्भावनापूर्ण तरीके से एफआईआर दर्ज कराने का अंदेशा बना रहता था। इस क्रांतिकारी फैसले के बाद अब बिना न्यायिक जांच और ठोस प्रमाणिकता के न तो एफआईआर होगी और न ही किसी वनकर्मी की गिरफ्तारी की जाएगी। शासन के इस अभूतपूर्व कदम से न केवल वन माफियाओं व तस्करों के हौसले पस्त होंगे, बल्कि दिन-रात घने जंगलों में जान हथेली पर रखकर तैनात रहने वाले मैदानी कर्मचारियों का आत्मविश्वास और मनोबल सातवें आसमान पर पहुंच गया है। सरकार और वन विभाग के इस अभूतपूर्व कदम की सराहना करते हुए क्षेत्र के वरिष्ठ प्रशासनिक व विभागीय अधिकारियों ने इसे वनों की समग्र सुरक्षा के लिए मील का पत्थर बताया है। डीएफओ उत्तर तरुण वर्मा ने इस महत्वपूर्ण निर्णय की जानकारी साझा करते हुए बताया कि वनों की संवेदनशीलता और आए दिन वनकर्मियों पर बढ़ रहे जानलेवा हमलों व खतरों को देखते हुए शासन ने यह रक्षा कवच प्रदान किया है। इस नए प्रावधान की परिधि में वनरक्षक (Forest Guard), वनपाल (Forester), उप वन क्षेत्रपाल, वन क्षेत्रपाल (Ranger), सहायक वन संरक्षक (ACF), उप वनमंडल अधिकारी (SDO), उप वन संरक्षक, उप संचालक, वनमंडल अधिकारी (DFO), क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक (CCF) तथा क्षेत्र संचालक सहित वन एवं वन्यजीव संरक्षण, संवर्धन और प्रबंधन से जुड़े सभी वर्दीधारी अधिकारी-कर्मचारी शामिल होंगे। इस कानून के लागू होने से अब मैदानी अमला बिना किसी कानूनी झंझट या झूठे मुकदमों के डर के, निर्भीक होकर आधुनिक हथियारों से लैस तस्करों और अवैध कब्जाधारियों का मुंहतोड़ जवाब दे सकेगा। खबर के हर पहलू को गहराई से देखें तो यह स्पष्ट होता है कि शासन ने सुरक्षा के साथ-साथ पारदर्शिता का भी पूरा ध्यान रखा है। प्रावधान के अनुसार, यदि ड्यूटी के दौरान किसी वनकर्मी द्वारा आग्नेयास्त्र का प्रयोग किया जाता है, तो उस प्रत्येक घटना की सूक्ष्मता से निष्पक्ष जांच संबंधित क्षेत्र के कार्यपालिक दंडाधिकारी (Executive Magistrate) द्वारा की जाएगी। जब तक न्यायिक जांच में यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित न हो जाए कि हथियार का प्रयोग सर्वथा अनुचित या नियम विरुद्ध था, तब तक किसी भी अधिकारी या कर्मचारी पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी। मध्य प्रदेश सरकार का यह दूरगामी फैसला राजपत्र में प्रकाशन की तिथि से प्रभावी माना जाएगा। राज्य सरकार, गृह विभाग और वन विभाग के इस समन्वित एवं जनकल्याणकारी फैसले की पूरे संभाग और प्रदेश भर में भूरी-भूरी प्रशंसा हो रही है। अधिकारियों और कर्मचारी संगठनों का कहना है कि इस सुरक्षात्मक नीति से प्रदेश की अमूल्य वन संपदा और दुर्लभ वन्यजीवों का संरक्षण अब और अधिक मजबूती व मुस्तैदी से हो सकेगा।
