शहडोल में जीवनदायिनी बनी बच्चों को ढोने का जरिया,वायरल वीडियो ने खोली स्वास्थ्य व परिवहन विभाग के दावों की पोल, उठ रहे संगीन सवाल
Junaid Khan - शहडोल। संभागीय मुख्यालय शहडोल एक बार फिर अपनी अजीबो-गरीब, अमानवीय और गैर-जिम्मेदाराना कार्यप्रणाली को लेकर चौतरफा सुखियों में है। जिस जिले में हर रोज एम्बुलेंस के अभाव में तड़पते मरीजों, खाट पर लादकर अस्पताल ले जाते परिजनों और वक्त पर इलाज न मिलने से थमते जीवन की चीखें गूंजती हों, उसी शहडोल की सड़कों पर एक जीवनदायिनी एम्बुलेंस निर्लज्जता से निजी स्कूल के बच्चों को ढोने वाली 'स्कूली वैन' बनकर दौड़ रही है। स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन के नाक के नीचे चल रहे इस गोरखधंधे ने जिले की संपूर्ण आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं, एम्बुलेंस प्रबंधन और आरटीओ मॉनिटरिंग व्यवस्था के चिथड़े उड़ा दिए हैं। मरीजों की सांसें बचाने के उद्देश्य से मिली इस व्यवस्था का खुलेआम व्यावसायिक और गैर-चिकित्सकीय इस्तेमाल प्रशासनिक निष्क्रियता और भ्रष्ट ढर्रे की गवाही दे रहा है।
सजग नागरिक का मोबाइल कैमरा बना जनता की ढाल,अमले में मचा हड़कंप
यह पूरा शर्मनाक वाकया शहर के अति-संवेदनशील व पॉश इलाके सर्किट हाउस के पास का है। जहां एक निजी स्कूल के मासूम बच्चों को ठूंस-ठूंस कर एम्बुलेंस में भरा जा रहा था और उन्हें स्कूल पहुंचाया जा रहा था। एम्बुलेंस की खिड़कियों से जब स्कूली बच्चों के बेबस चेहरे बाहर झांकते दिखे, तो वहां से गुजर रहे एक सजग और जागरूक नागरिक ने मुस्तैदी दिखाते हुए इस हैरान कर देने वाले नजारे को अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लिया। देखते ही देखते यह सनसनीखेज वीडियो सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल गया। आम जनता ने इस सजग नागरिक की तत्परता की जमकर सराहना की है, जिसने प्रशासन के सोए हुए जमीर को झकझोर कर रख दिया। वीडियो वायरल होते ही प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया और अधिकारियों की सफाई की नाकामी उजागर होने लगी।
आपात स्थिति में एम्बुलेंस की किल्लत, जिंदगी और मौत के बीच झूलती जनता पूछ रही सवाल
जिले में आए दिन एम्बुलेंस न मिलने के कारण गंभीर मरीजों को निजी वाहनों या खाट-चारपाई पर अस्पताल पहुंचाने की दर्दनाक तस्वीरें सामने आती रहती हैं। जब दूर-दराज के ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में गंभीर मरीज व गर्भवती महिलाएं जीवन और मौत की अंतिम जंग लड़ रही हों, तब एक आपातकालीन चिकित्सीय वाहन का इस्तेमाल निजी स्कूल संचालक के स्वार्थ के लिए होना किसी बड़े अमानवीय अपराध और अक्षम्य लापरवाही से कम नहीं है। स्थानीय नागरिकों का आक्रोश फूट पड़ा है; लोगों का कहना है कि यदि इसी दौरान किसी आपात स्थिति में एम्बुलेंस की जरूरत पड़ जाती, तो इस आपराधिक लापरवाही की भरपाई कौन करता? क्या मासूम बच्चों या तड़पते मरीजों की जान इतनी सस्ती हो चुकी है?
किसके संरक्षण में फल-फूल रहा यह खेल? आरटीओ,स्वास्थ्य विभाग व प्रशासन की चुप्पी पर उठते तीखे सवाल
वीडियो सामने आने के बाद अब जिला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और परिवहन विभाग की नीयत पर कई कड़े और तीखे सवाल खड़े हो गए हैं। 1.यह एम्बुलेंस किस निजी अस्पताल, एनजीओ या सरकारी संस्था की है? 2.किस बड़े अधिकारी या रसूखदार की शह व अनुमति से इस चिकित्सीय वाहन को धड़ल्ले से स्कूल वैन में तब्दील कर दिया गया? 3.मरीजों के वाहन का ऐसा कमर्शियल और गैर-चिकित्सकीय उपयोग होने पर परिवहन विभाग (RTO) और स्वास्थ्य महकमा अब तक आंखें मूंदकर क्यों बैठा था? फिलहाल, जनता द्वारा बनाए गए इस वायरल वीडियो ने स्वास्थ्य विभाग की खोखली मॉनिटरिंग और प्रशासनिक गश्त पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिया है। अब पूरे जिले की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या जिला प्रशासन व संबंधित जिम्मेदार अधिकारी इस गंभीर मामले पर निष्पक्ष जांच बैठाकर दोषियों और फर्जीवाड़ा करने वाले स्कूल व एम्बुलेंस संचालकों पर शिकंजा कसेंगे, या फिर हर बार की तरह इस रसूखदार मामले को भी कागजी खानापूर्ति कर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
