जिला अस्पताल की मैटरनिटी विंग बनी ‘मौत का कुआं,बंद एसी से टपक रहा पानी,दीवारों पर जमा फंगस दे रहा गंभीर इन्फेक्शन को न्योता

लेबर रूम और ओटी में पानी की बूंद-बूंद को तरस रहे मरीज,सिविल सर्जन, मैनेजर व मेट्रन की अनदेखी से उबले स्वास्थ्यकर्मी, खोला मोर्चा


Junaid Khan - शहडोल। प्रदेश सरकार भले ही बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और हाईटेक अस्पतालों के बड़े-बड़े दावे कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट और रूह कंपा देने वाली है। जिला चिकित्सालय शहडोल का मैटरनिटी विंग (प्रसूति विभाग) इस समय घोर प्रशासनिक कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार और अनियंत्रित अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ चुका है। यहाँ नवजात शिशुओं और प्रसूताओं (गर्भवती महिलाओं) की जिंदगी को सीधे तौर पर मौत के मुहाने पर धकेल दिया गया है। लेबर रूम और ऑपरेशन थियेटर (ओटी) जैसी अति-संवेदनशील और संक्रमण-मुक्त रखी जाने वाली जगह पर बुनियादी सुविधाओं का भयंकर अकाल है। भीषण गर्मी के दौर से ही ओटी का एयर कंडीशनर (एसी) पिछले एक साल से बंद पड़ा हुआ है, जिससे भीषण उमस और बदहाली का आलम बना हुआ है। अब आलम यह है कि बंद पड़े एसी से लगातार पानी टपककर ओटी के भीतर गिर रहा है, जिसकी नमी के कारण दीवारों पर काली फंगस (फंगल इन्फेक्शन का गढ़) जम चुकी है। अत्यंत गंभीर व जानलेवा इन्फेक्शन के इस खौफनाक माहौल में प्रसूताओं का सिजेरियन ऑपरेशन करने को मजबूर डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों का सब्र अब पूरी तरह टूट चुका है। कर्मचारियों ने अस्पताल प्रबंधन और स्वास्थ्य विभाग की अकर्मण्यता पर तीखे सवाल खड़े करते हुए आर-पार का मोर्चा खोल दिया है। डॉक्टरों का साफ़ कहना है कि फंगस और गंदगी के बीच ऑपरेशन करना मरीजों की जिंदगी से सरासर खिलवाड़ और क्रूरता है, लेकिन कुंभकर्णी नींद में सोया प्रशासनिक अमला किसी बड़े हादसे या जनहानि के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे बैठा है। बिना वजह स्टाफ में फेरबदल और पानी की किल्लत से चरमराई व्यवस्था, पल्ला झाड़ने में जुटे जिम्मेदार

अस्पताल के पीड़ित कर्मचारियों व स्वास्थ्यकर्मियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मैटरनिटी विंग में दिन-रात प्रसव और सिजेरियन ऑपरेशन का दौर चलता रहता है, लेकिन इसके बावजूद यहाँ पर्याप्त पानी तक मय्यत नहीं हो पा रहा है। गर्मी में तो जलस्तर गिरने का झुनझुना थमा दिया गया था, लेकिन अब झमाझम बारिश के मौसम में भी पानी न होने से सफाई व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ गया है, जिससे प्रसूताओं व नवजात बच्चों में सेप्सिस और इन्फेक्शन फैलने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, प्रशासनिक स्तर पर अनुभवी और प्रशिक्षित स्टाफ को बिना किसी ठोस वजह के बार-बार बदला जा रहा है। इस खींचतान और मानसिक तनाव का सीधा असर मरीजों तीमारदारों की देखभाल पर पड़ रहा है। स्टाफ का कहना है कि उन्होंने सिविल सर्जन, अस्पताल मैनेजर और मेट्रन को दर्जनों बार लिखित और मौखिक शिकायतों के माध्यम से इस बदहाली से रूबरू कराया, यहाँ तक कि पिछले महीने विंग के डॉक्टरों ने भी व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर स्थिति सुधारने की गुहार लगाई थी, परंतु नतीजा वही 'ढाक के तीन पात' यानी सिफर रहा।

जिम्मेदारों की लीपापोती और नाकामी 

जब इस पूरे गंभीर मामले और जन-स्वास्थ्य से खिलवाड़ पर जिला अस्पताल की सिविल सर्जन डॉ. शिल्पी सराफ से बात की गई, तो उन्होंने अपनी नाकामी छुपाने और लीपापोती करने वाला रटा-रटाया बयान देते हुए कहा कि “अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर निर्देश दिए गए हैं। एसी को हाल ही में सुधरवाया गया था और अभी एसी चल रहा है, रही बात पानी की तो पानी आ रहा है।” अब देखना यह होगा कि इस भ्रामक व लीपापोती वाले रवैये के बाद जिला प्रशासन, स्वास्थ्य आयुक्त और शासन इस खबर का संज्ञान लेकर लापरवाह अधिकारियों पर गाज गिराते हैं या फिर किसी मासूम की बलि चढ़ने का इंतजार करते हैं।

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