शासकीय आवास में एएसआई का शव मिलने से हड़कंप, स्वास्थ्य व्यवस्था और पुलिस महकमे पर उठे गंभीर सवाल

शासकीय आवास में एएसआई का शव मिलने से हड़कंप, स्वास्थ्य व्यवस्था और पुलिस महकमे पर उठे गंभीर सवाल


Junaid Khan - शहडोल। जिले के कोतवाली थाने में पदस्थ 60 वर्षीय सहायक उप निरीक्षक (एएसआई) कैलाश मिश्रा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने पुलिस महकमे, जिला प्रशासन और स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। पुलिस लाइन न्यू कॉलोनी के बी-ब्लॉक स्थित शासकीय आवास (कमरा नंबर 13) में अकेले रह रहे एएसआई का शव उनके बिस्तर पर मिलने से पूरे क्षेत्र में सनसनी फैल गई। डायल-112 में तैनात कैलाश मिश्रा बुधवार देर शाम ड्यूटी खत्म कर घर लौटे थे। बताया जा रहा है कि गुरुवार तड़के सीने में तेज दर्द उठने पर उन्होंने खुद डायल-112 की मदद से जिला अस्पताल पहुंचकर प्राथमिक उपचार कराया और दवाइयां लेकर वापस लौट आए। सुबह जब ड्यूटी का समय हुआ और पायलट द्वारा बार-बार फोन करने पर भी उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया, तब जाकर मामले का भंडाफोड़ हुआ। सूचना मिलते ही कोतवाली थाना प्रभारी रावेंद्र तिवारी पुलिस टीम के साथ पहुंचे और बंद दरवाजा खोलकर देखा तो एएसआई बिस्तर पर मृत पड़े थे।

प्राथमिक उपचार के बाद घर भेजना बना काल, परिजनों में आक्रोश 

घटना की जानकारी मिलते ही विभागीय अधिकारियों में अफरा-तफरी मच गई। पुलिस ने तुरंत उनके परिजनों को सूचित किया और शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाया। हालांकि, इस घटना के बाद से आम जनता और मृतक के करीबियों में भारी नाराजगी है। सवाल यह उठ रहा है कि जब एक ऑन-ड्यूटी पुलिस अधिकारी तड़के सीने में तेज दर्द (कार्डिएक अरेस्ट के लक्षण) की शिकायत लेकर जिला अस्पताल पहुंचता है, तो डॉक्टरों ने उन्हें गंभीर अवस्था में ऑब्जर्वेशन में रखने के बजाय केवल दवा देकर घर क्यों भेज दिया? क्या अस्पताल प्रशासन की यह जल्दबाजी या लापरवाही एक जांबाज पुलिसकर्मी की जान पर भारी पड़ गई? अब सभी की निगाहें पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिसके बाद ही मौत के असली कारणों और जिम्मेदार डॉक्टरों की लापरवाही का खुलासा हो सकेगा।

जब पुलिस लाइन में जवान महफूज नहीं, तो आम नागरिक कैसे रहें सुरक्षित? 

इस दुखद हादसे ने शासन-प्रशासन के उन तमाम दावों की हवा निकाल दी है, जिनमें पुलिस कर्मचारियों के कल्याण और त्वरित चिकित्सा सेवा की बातें की जाती हैं। स्थानीय नागरिकों और प्रबुद्ध वर्ग का कहना है कि जब कानून-व्यवस्था संभालने वाले और डायल-112 जैसी आपातकालीन सेवा में तैनात जवान ही अपने ही शासकीय परिसर में तड़प-तड़प कर जान गंवाने को मजबूर हैं, तो आम जनता की सुरक्षा का क्या आलम होगा? जिम्मेदार अधिकारियों की अनदेखी और विभागीय स्तर पर समय पर सुध न लिए जाने के रवैये को लेकर जनता में तीखा रोष है। क्षेत्रवासियों ने मांग की है कि इस मामले में न केवल चिकित्सा स्तर पर हुई कोताही की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए, बल्कि महकमे में अकेले रहने वाले वरिष्ठ कर्मियों की सुरक्षा और मॉनिटरिंग के लिए जिम्मेदार संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।

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