स्वास्थ्य विभाग की घोर लापरवाही से तीन जिंदगियां दांव पर,मेडिकल कॉलेज रेफर,जनता के सब्र ने टाला बड़ा हादसा
Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सरकारी अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और सुरक्षित प्रसव के दावों की धज्जियां जिला अस्पताल में उस वक्त उड़ गईं, जब शुक्रवार-शनिवार की दरमियानी रात ऑपरेशन थियेटर (ओटी) में ले जाई जा चुकीं तीन गंभीर प्रसूताओं को अंतिम समय पर मेडिकल कॉलेज रेफर करना पड़ा। ऑपरेशन की तमाम तैयारियां पूरी थीं, प्रसूताएं प्रसव पीड़ा से कराह रही थीं और परिजन बदहवास थे, लेकिन ऑन-ड्यूटी एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉ. आयुषी पाण्डे अपनी ड्यूटी से नदारद रहीं। हद तो तब हो गई जब अस्पताल प्रशासन द्वारा तत्काल कॉल बुक भेजी गई, जिसे ठुकराते हुए महिला डॉक्टर ने फौरन आने से दो-टूक मना कर दिया। स्वास्थ्य महकमे की इस अमानवीय और संवेदनहीन कार्यशैली के कारण नवजात और माताओं की जान सीधे तौर पर जोखिम में डाल दी गई।
परिजनों और जनता के संयम से बची जान, लाचार दिखा सिस्टम
ऐसी अत्यंत नाजुक और जानलेवा स्थिति में भी पीड़ित परिवारों और जागरूक जनता ने गजब के धैर्य व सजगता का परिचय दिया। बिना किसी उपद्रव के परिजनों ने तात्कालिक प्राथमिकता मरीजों की जान बचाने को दी और आनन-फानन में तीनों प्रसूताओं को मेडिकल कॉलेज ले जाकर समय रहते उपचार सुनिश्चित कराया। यदि आम जनता ने समझदारी नहीं दिखाई होती और समय पर कदम नहीं उठाए होते, तो अस्पताल प्रबंधन की इस आपराधिक लापरवाही से कोई भी बड़ी अनहोनी घट सकती थी। स्वास्थ्य विभाग की चरमराती व्यवस्था पर जनता का आक्रोश पूरी तरह जायज है, क्योंकि करोड़ों के बजट और सरकारी दावों के बावजूद गरीब मरीजों को आधी रात को दर-ब-दर भटकने पर मजबूर किया जा रहा है।
अफसरों की केवल कागजी खानापूर्ति,कब होगी लापरवाहों पर सख्त कार्रवाई?
अस्पताल की इस गंभीर स्थिति पर सिविल सर्जन डॉ. शिल्पी सराफ का कहना है कि वे दिल्ली ट्रेनिंग पर हैं, लेकिन डॉ. आयुषी पाण्डे का ड्यूटी के प्रति गैर-जिम्मेदाराना और लापरवाह रवैया पहले भी रहा है, जिसके संबंध में उच्चाधिकारियों को पूर्व में ही लिखित रूप से अवगत कराया जा चुका है। वहीं, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. राजेश मिश्रा ने बताया कि पूर्व सिविल सर्जन की ओर से भी डॉ. पाण्डे के खिलाफ ड्यूटी पर न पहुंचने की शिकायतें प्राप्त हुई हैं। अब मामले में नोटिस जारी कर जवाब मांगा जाएगा और कार्रवाई प्रस्तावित की जाएगी। सवाल उठता है कि जब उक्त डॉक्टर की लापरवाही का रिकॉर्ड पुराना है, तो प्रशासन अब तक मूकदर्शक क्यों बना रहा? क्या स्वास्थ्य विभाग और जिम्मेदार अधिकारी केवल 'नोटिस-नोटिस' का खेल खेलते रहेंगे या मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले ऐसे डॉक्टरों पर तत्काल निलंबन और कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी?
