ठेकेदार की अंधाधुंध वसूली और स्वास्थ्य विभाग व ज़िला प्रशासन की ख़ामोशी पर उठे गंभीर सवाल, अस्पताल गेट से लेकर कैंटीन तक अव्यवस्था का बोलबाला
Junaid Khan - शहडोल। संभागीय मुख्यालय स्थित ज़िला अस्पताल इन दिनों स्वास्थ्य सुविधाओं से ज़्यादा पार्किंग के नाम पर जारी अनियंत्रित मनमानी और अराजकता के लिए अखाड़ा बना हुआ है। एक तरफ प्रदेश के उपमुख्यमंत्री, जो स्वयं स्वास्थ्य विभाग का ज़िम्मा संभालने के साथ-साथ शहडोल ज़िले के प्रभारी मंत्री भी हैं, उनके ही प्रभाव वाले क्षेत्र में ज़िला अस्पताल की व्यवस्थाएं पूरी तरह वेंटिलेटर पर नज़र आ रही हैं। अस्पताल परिसर में मरीज़ों और उनके परिजनों के वाहनों की सुरक्षा पूरी तरह बेपटरी हो चुकी है। सुबह 9 बजे से दोपहर ढाई बजे तक ज़िला अस्पताल में जहां एक ओर दूर-दराज़ से आए असहाय रोगियों का जमावड़ा रहता है, वहीं दूसरी ओर पार्किंग के नाम पर अवैध वसूली करने वाला ठेकेदार अपनी जेब भरने में मस्त है। ठेकेदार ने मुनाफ़ा कमाने के चक्कर में सुरक्षाकर्मियों की भारी कटौती कर रखी है, जिसके चलते पार्किंग क्षेत्र में बेतरतीब ढंग से खड़े वाहन हर पल चोरी होने की कगार पर रहते हैं। बीते दिनों अस्पताल के ही एक अस्थाई कर्मचारी की बाइक चोरी हो जाना इस बात का साक्षात प्रमाण है कि यहां कानून और व्यवस्था का ख़ौफ़ ख़त्म हो चुका है।
जिम्मेदारों का मौन और ठेकेदार का तांडव: रसीद काटो,पैसा लो और गायब हो जाओ
अस्पताल परिसर में ज़मीन से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक ठेकेदार की तानाशाही साफ़ दिखाई दे रही है। पार्किंग स्थल का रख-रखाव और वाहनों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी पूरी तरह शून्य हो चुकी है। ठेके पर तैनात कर्मचारियों का एकमात्र मकसद किसी भी तरह रसीद काटकर पैसा वसूलना रह गया है; वाहन सही ढंग से पार्क हुआ है या नहीं, इससे उनका कोई सरोकार नहीं है। आलम यह है कि अस्पताल के मुख्य प्रवेश द्वार, शेड के नीचे, ब्लड बैंक तथा कैंटीन के आसपास वाहनों का ऐसा जमावड़ा और अव्यवस्थित अंबार लगा रहता है कि आपातकालीन स्थिति में स्ट्रेचर और एम्बुलेंस तक का रास्ता बंद हो जाता है। ड्यूटी पर आने वाले डॉक्टरों और नर्सिंग अधिकारियों तक को अपना वाहन खड़ा करने के लिए भारी जद्दोजहद करनी पड़ती है। जब अस्पताल के अपने ही कर्मचारी और चिकित्सक सुरक्षित नहीं हैं, तो आम जनता की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा? ज़िला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारी सब कुछ जानते हुए भी धृतराष्ट्र बने बैठे हैं, जिससे यह आशंका बलवती होती है कि इस पूरी लापरवाही के पीछे निचले स्तर से लेकर ऊपर तक कोई बड़ा मौन संरक्षण खेल रहा है।
प्रशासन की खोखली चेतावनी और डिप्टी सीएम की साख पर उठते कड़े सवाल
इस पूरे प्रकरण में स्वास्थ्य विभाग और ज़िला अस्पताल प्रबंधन का रवैया बेहद गैर-जिम्मेदाराना और रस्म अदायगी भर नज़र आता है। अस्पताल प्रबंधन की ओर से केवल "ठेकेदार को बुलाकर समझाइश देने और पत्राचार करने" की बात कहकर अपने कर्तव्यों से इतिश्री कर ली जाती है, जबकि ज़मीन पर इसका कोई असर दिखाई नहीं दे रहा है। ज़िले की कमान संभालने वाले डिप्टी सीएम व प्रभारी मंत्री के प्रशासनिक दावों के बीच इस तरह की खुलेआम अव्यवस्था और वसूली सीधे तौर पर शासन-प्रशासन के मुंह पर करारा तमाचा है। यदि ज़िला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के आला अफ़सरों ने इस ठेकेदार की मनमानी पर तुरंत लगाम नहीं कसी, रसीद वसूली के अनुपात में सुरक्षाकर्मियों की तैनाती सुनिश्चित नहीं की और पार्किंग व्यवस्था को दुरुस्त नहीं कराया, तो आने वाले दिनों में यह जनाक्रोश एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है। देखना अब यह होगा कि शासन-प्रशासन इस अंधेरगर्दी पर क्या कड़ा कदम उठाता है या फिर कागज़ी पत्राचार के खेल में आम जनता यूं ही लुटती और परेशान होती रहेगी।
