सुरक्षा में भारी चूक,न्याय के मंदिर में महिला अधिवक्ता की जासूसी,कोर्ट परिसर में चुपके से बनाया वीडियो,पुलिस-प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
Junaid Khan - शहडोल। जयसिंहनगर।कानून के रखवालों की सुरक्षा और न्याय की चौखट पर न्याय मांगने वालों के स्वाभिमान को ठेंगा दिखाने का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। जयसिंहनगर स्थित न्यायालय परिसर के भीतर एक महिला अधिवक्ता का बिना उनकी अनुमति के चोरी-छिपे वीडियो बनाए जाने और उसे सार्वजनिक कर वायरल करने की घटना से वकीलों और आम जनता में भारी आक्रोश है। संवेदनशील न्यायालय परिसर के भीतर इस तरह की अनधिकृत निगरानी और जासूसी की घटना ने न केवल पुलिस-प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि जब न्याय का मंदिर ही सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक कहां जाएं? प्राप्त जानकारी के अनुसार, जयसिंहनगर की महिला अधिवक्ता संध्या तिवारी (पति विनोद कुमार मिश्रा, निवासी वार्ड क्र. 01 जयसिंहनगर) ने पुलिस थाने में एक शिकायती आवेदन सौंपकर गंभीर आरोप लगाए हैं। शिकायत में उल्लेख किया गया है कि 13 सितंबर 2026 को उन्हें एक वीडियो प्राप्त हुआ, जिसमें वह न्यायालय परिसर के भीतर उपस्थित थीं और बिना उनकी सहमति अथवा माननीय न्यायालय की अनुमति के उनका गुप्त वीडियो रिकॉर्ड किया गया था। आरोप है कि यह वीडियो न केवल अनधिकृत रूप से बनाया गया, बल्कि इसे अन्य व्यक्तियों तक भी भेजा गया। पूछताछ करने पर पता चला कि उक्त वीडियो आनंद प्रताप सिंह पटेल द्वारा भेजा गया है। शिकायतकर्ता अधिवक्ता का आरोप है कि उन्हें जान से मारने की धमकियां भी मिल रही हैं और यह पूरा षड्यंत्र उनके द्वारा पूर्व में की गई शिकायतों में गवाहों को डराने व निष्पक्ष कार्रवाई को बाधित करने के लिए रचा जा रहा है। मामले में आरोपी आनंद प्रताप सिंह पटेल का कहना है कि लगाए गए आरोप निराधार हैं और उन्होंने कोई वीडियो नहीं बनाया है, हालांकि पुलिस अब इस पूरे मामले की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है।अस्पताल से लेकर कोर्ट तक उत्पीड़न: आखिर मौन क्यों है शासन और जिम्मेदार महकमा? यह कोई पहला मामला नहीं है जब पीड़ित महिला अधिवक्ता को निशाना बनाया गया हो। इससे पूर्व भी जयसिंहनगर सिविल अस्पताल में इलाज के दौरान हुए विवाद में डॉक्टर आशुतोष मिश्रा और सह-कर्मचारी पुष्पराज पटेल पर बदसलूकी करने, अभद्र व्यवहार करने और शिकायत वापस लेने का दबाव बनाने के संगीन आरोप लगे थे, जिसकी एफआईआर/एनसीआर (NCR No. 138/2026) पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज है। हैरान करने वाली बात यह है कि सिविल अस्पताल परिसर से लेकर न्यायालय परिसर तक लगातार एक महिला अधिवक्ता को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने और दबाव बनाने का खेल चल रहा है, लेकिन संबंधित प्रशासनिक व स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारी मामले को ठंडे बस्ते में डालकर तमाशबीन बने हुए हैं। कानून के जानकारों का कहना है कि कोर्ट परिसर में बिना अनुमति किसी का वीडियो बनाना न केवल निजता के अधिकार का सीधा हनन है, बल्कि अदालत की गरिमा और सुरक्षा प्रोटोकॉल पर भी सीधा हमला है। इस घटना से यह साफ झलकता है कि स्थानीय पुलिस व प्रशासन की ढिलाई के कारण असामाजिक तत्वों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि वे न्यायालय परिसर के भीतर भी जासूसी करने से नहीं हिचक रहे। पीड़ित अधिवक्ता ने पुलिस से निष्पक्ष जांच कर वीडियो बनाने, इसे प्रसारित करने और धमकी देने वाले तमाम दोषियों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई की मांग की है। अब देखना यह होगा कि सुशासन का दावा करने वाला शासन और पुलिस महकमा इस मामले में क्या कड़े कदम उठाता है या फिर जिम्मेदार अधिकारी हर बार की तरह जांच का झुनझुना थमाकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं।
