मेंटेनेंस के नाम पर ठप रहीं स्वास्थ्य सुविधाएं, सीटी स्कैन से लेकर वेंटिलेटर और पंखे तक रहे बंद,जिम्मेदार अधिकारियों ने साधी सा चुप्पी
Junaid khan - शहडोल। जिला अस्पताल परिसर में स्वास्थ्य सेवाओं की पोल उस वक्त खुल गई, जब मेंटेनेंस के नाम पर गुरुवार सुबह 7.30 बजे से दोपहर 1 बजे तक लगातार करीब छह घंटे बिजली सप्लाई बंद रखी गई। सरकार और जिला प्रशासन जहां एक ओर आम जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और निर्बाध विद्युत आपूर्ति देने के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जिला अस्पताल की इस चरमराती व्यवस्था ने प्रशासनिक उदासीनता को बेनकाब कर दिया है। लगभग छह घंटे तक बिजली गायब रहने से अस्पताल की इमरजेंसी सेवाओं समेत सीटी स्कैन, एक्स-रे और सोनोगाफी जैसी अति-आवश्यक जांचें पूरी तरह ठप पड़ गईं। सबसे दर्दनाक स्थिति बच्चा वार्ड और मेडिकल वार्ड में देखने को मिली, जहां भीषण गर्मी और उमस के बीच पंखे बंद होने से नवजात शिशु और गंभीर मरीज तड़पने को मजबूर हो गए। हालात इतने बदतर हो गए कि कई मरीजों को परिजन बेहाल स्थिति में वार्डों से बाहर निकालकर गैलरी में ले जाने को विवश हुए। अस्पताल प्रशासन की इस लापरवाही ने जिला अस्पताल और स्वास्थ्य विभाग के दावों पर कड़ा आघात किया है।
अस्पताल की दोहरी व्यवस्था और जनरेटर बैकअप के दावों पर भी अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। अस्पताल परिसर में कहने को दो अलग-अलग बिजली लाइनें बिछाई गई हैं, लेकिन जिस मुख्य लाइन से अस्पताल भवन जुड़ा है, मेंटेनेंस का काम उसी लाइन पर रख दिया गया। दिलचस्प बात तो यह रही कि जहां मरीज गर्मी और बिना जांच के बेहाल हो रहे थे, वहीं मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) कार्यालय वाले भवन में बिजली की निर्बाध सप्लाई लगातार चालू रही। कागजों में अस्पताल प्रबंधन के पास चार-चार जनरेटर उपलब्ध होने की बात दर्ज है, लेकिन इस आपात स्थिति में केवल दो ही जनरेटर चलाए गए। सहायक प्रबंधक पूजा सोनी का कहना है कि इमरजेंसी, ओटी और आईसीयू में जनरेटर से बिजली दी जा रही थी। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि जब अस्पताल में सैकड़ों मरीजों की भीड़ मौजूद थी, तब सामान्य वार्डों और जांच विभागों के लिए संपूर्ण बैकअप की व्यवस्था क्यों नहीं की गई? क्या सरकारी सुविधाओं के नाम पर आए जनरेटर सिर्फ शो-पीस बनकर रह गए हैं? अस्पताल को निर्बाध बिजली सप्लाई मुहैया कराने के नाम पर जारी योजनाओं में सरकारी बजट का किस प्रकार दुरुपयोग हो रहा है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण 33 केवी लाइन का अधूरा निर्माण कार्य है। करीब दो साल पहले अस्पताल के लिए 33 केवी लाइन बिछाने का काम शुरू हुआ था, जो दो साल बीत जाने के बाद भी आज तक अधूरा पड़ा हुआ है। इस लेती-लतीफी का सीधा असर निर्माणाधीन मैटरनिटी भवन और पूरे अस्पताल परिसर पर पड़ रहा है। इस पूरे घटनाक्रम में जब जवाबदेही तय करने की बात आई, तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारी एक-दूसरे पर ढोलना शुरू कर दिया। एमपीईबी के डीई जितेंद्र कुमार गुप्ता का कहना है कि 33 केवी लाइन का काम पीडब्ल्यूडी विभाग करवा रहा है। वहीं दूसरी ओर जब विभाग के ईएंडएम इंजीनियर मीनू खान से मामले में निष्पक्ष जानकारी लेने के लिए संपर्क साधा गया, तो उन्होंने फोन रिसीव करना भी मुनासिब नहीं समझा। इस प्रकार जिम्मेदार अधिकारियों की टालमटोल की नीति और गैर-जिम्मेदाराना रवैये के कारण अस्पताल की आपातकालीन व्यवस्था पूरी तरह पंगु बनी हुई है, जिससे आम जनता और मरीजों में भारी आक्रोश व्याप्त है।
