जिंदगी की ‘डायलिसिस’ और आर्थिक तंगी का दंश 08 माह से मौत से जूझ रहा नाई विनोद, कलेक्टर से लगाई जीवन रक्षा की गुहार

हर चौथे दिन अस्पताल पहुंचने के लिए किराया तक नहीं,दाने-दाने को तरस रहा सोहागपुर के मिठौरी गांव का पीड़ित परिवार,आयुष्मान व रेडक्रॉस से मदद की उम्मीद


Junaid khan - शहडोल। एक तरफ जहां सरकार और स्वास्थ्य विभाग अंतिम छोर के व्यक्ति तक बेहतर चिकित्सीय सुविधाएं पहुंचाने का ढिंढोरा पीटते हैं, वहीं धरातल पर गरीबी और गंभीर बीमारी का दोहरा प्रहार किसी हंसते-खेलते परिवार को तबाही की कगार पर खड़ा कर देता है। कुछ ऐसा ही हृदयविदारक मामला शहडोल जिले के सोहागपुर तहसील अंतर्गत ग्राम मिठौरी से सामने आया है। यहां के निवासी विनोद कुमार नापित (पिता/पति) पिछले 8 महीनों से गंभीर बीमारी की चपेट में हैं और उन्हें हर चौथे दिन अपनी जिंदगी बचाने के लिए शहडोल जिला अस्पताल में डायलिसिस कराना पड़ रहा है। कभी अपने हाथों के हुनर और नाई के काम से पूरे परिवार की आजीविका चलाने वाले विनोद आज पूरी तरह बिस्तर पर लाचार हैं। घर के इकलौते कमाऊ सदस्य के असहाय होने से परिवार के सामने न केवल रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है, बल्कि इलाज का खर्च जुटाना भी नामुमकिन साबित हो रहा है।

किराए के 500 रुपये जुटाना बना आफत,दो वक्त की रोटी पर संकट

पीड़ित विनोद कुमार की पत्नी श्रीमती किरण नापित ने अपनी इस असीम पीड़ा को लेकर जिला कलेक्टर कार्यालय शहडोल में गुहार लगाई है। आवेदन पत्र के माध्यम से किरण ने बताया कि गांव मिठौरी से शहडोल अस्पताल तक पति को डायलिसिस के लिए लाने-ले जाने में दो लोगों का आने-जाने का किराया ही लगभग 500 रुपये खर्च हो जाता है। हर चौथे दिन इतना बड़ा खर्च उठाना इस निर्धन परिवार के बस से बाहर हो चुका है। इसके अलावा डायलिसिस, महंगी दवाइयों और अन्य सहायक उपचारों के खर्च ने परिवार की कमर तोड़ दी है। पत्नी के सामने अब यह यक्ष प्रश्न खड़ा है कि वह अपने पति का इलाज कराए, अस्पताल जाने का किराया जुटाए या छोटे-छोटे बच्चों के लिए दो वक्त के भोजन की व्यवस्था करे। आर्थिक तंगी का आलम यह है कि पैसों के अभाव में इलाज रुकने और अनहोनी होने की आशंका लगातार बनी हुई है।

प्रशासनिक संवेदनशीलता की परीक्षा,आयुष्मान और रेडक्रॉस से संजीवनी की आस

मामला सीधे तौर पर जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा हुआ है। पीड़ित परिवार ने कलेक्टर महोदय से गुहार लगाते हुए मांग की है कि उन्हें रेडक्रॉस फंड अथवा शासकीय स्वास्थ्य योजनाओं के अंतर्गत तत्काल आर्थिक सहायता प्रदान की जाए। साथ ही, आयुष्मान भारत योजना व अन्य जन कल्याणकारी योजनाओं के तहत मुफ्त दवाइयां और आवागमन हेतु आर्थिक सहयोग की स्वीकृति दी जाए। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जिला प्रशासन इस अत्यंत दयनीय और मानवीय मामले में कितनी तत्परता दिखाता है। क्या जिम्मेदार अधिकारी कागजी फाइलों से बाहर निकलकर इस पीड़ित परिवार तक समय रहते शासकीय योजनाओं की ‘संजीवनी’ पहुंचा पाते हैं या फिर एक लाचार परिवार सिर्फ आश्वासनों के भरोसे अपनी जिंदगी की जंग लड़ता रहेगा।

Previous Post Next Post