रसोई पर संकट,एजेंसी के चक्कर,08 माह से नए एलपीजी कनेक्शन ठप, महंगे विकल्पों से बिगड़ा आम आदमी का बजट

रसोई पर संकट,एजेंसी के चक्कर,08 माह से नए एलपीजी कनेक्शन ठप, महंगे विकल्पों से बिगड़ा आम आदमी का बजट


Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में आम आदमी के चूल्हे पर महंगाई और प्रशासनिक बेरुखी की दोहरी मार पड़ रही है। बीते लगभग आठ महीनों से जिले भर में घरेलू एलपीजी गैस कनेक्शनों की आवंटन प्रक्रिया पूरी तरह ठप पड़ी हुई है। स्थिति यह बन चुकी है कि नए मकान में शिफ्ट हुए परिवार हों, किराए के मकान में रहने वाले कामकाजी लोग हों या फिर नए शादी-शुदा जोड़े, हर कोई एक एलपीजी सिलेंडेर पाने के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। ऑनलाइन आवेदन पोर्टल बंद पड़े हैं और जब लोग गैस एजेंसियों के दफ्तर पहुंचते हैं, तो उन्हें केवल आश्वासन का झुनझुना थमाकर लौटा दिया जाता है। दूसरी ओर, इस पूरी अव्यवस्था का सीधा फायदा उठाकर कुछ एजेंसियां और बिचौलिए उपभोक्ताओं को चूना लगाने में लगे हैं। नियमित घरेलू कनेक्शन बंद होने की आड़ में उपभोक्ताओं को 10 किलो वाले छोटे कमर्शियल पोर्टेबल सिलेंडर का थमाए जा रहे हैं, जिनकी शुरुआती लागत ही करीब ₹5,200 बताई जा रही है। हर महीने भारी-भरकम रिफिलिंग का खर्च उठाने में मध्यमवर्ग और आम नौकरीपेशा परिवारों का मासिक बजट पूरी तरह चरमरा गया है। रसोई में गैस न होने के कारण कई परिवार बिजली के महंगे उपकरणों का सहारा ले रहे हैं, तो ग्रामीण और बाहरी इलाकों में लोग फिर से लकड़ी और पारंपरिक चूल्हा जलाने पर मजबूर हो चुके हैं।

प्रशासन का ढुलमुल रवैया और कागजी जवाब

इस पूरे गंभीर मामले पर जिला प्रशासन और खाद्य आपूर्ति विभाग की चुप्पी पर भी बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। जिला खाद्य एवं आपूर्ति अधिकारी भागीरथी लहरे का कहना है कि नए गैस सिलेंडर आवंटन की प्रक्रिया शासन स्तर से ही रुकी हुई है। उनका तर्क है कि जब तक ऊपर से दिशा-निर्देश और आवंटन की हरी झंडी नहीं आती, तब तक स्थानीय स्तर पर एजेंसियां भी असहाय हैं। हालांकि, सवाल यह उठता है कि इतने महीनों से आम जनता की बुनियादी समस्या को लेकर जिला प्रशासन द्वारा शासन को कड़ा पत्र या स्मरण पत्र क्यों नहीं भेजा गया? शासन और जिम्मेदार अधिकारियों के इस ढुलमुल रवैये से जनता में खासा आक्रोश पनप रहा है।

उपभोक्ताओं की ज़ुबानी, बदहाली की कहानी

शहर में बाहर से आकर नौकरी कर रहे अंकुश नेवारे का कहना है कि स्थानांतरण के बाद उन्हें उम्मीद थी कि आसानी से कनेक्शन मिल जाएगा, लेकिन एजेंसी से साफ टका-सा जवाब मिल जाता है कि पोर्टल बंद है। वहीं कल्याणपुर निवासी मीरा सिंह का कहना है कि रिश्तेदारों से सिलेंडर मांगकर काम चलाना अब संभव नहीं रहा; अस्थाई सिलेंडरों का खर्च इतना अधिक है कि बजट संभालना मुश्किल हो गया है। प्राइवेट कर्मचारी राधा सिंह गोंड ने बताया कि बीते 6 महीने से चक्कर काटने के बाद भी सिर्फ यही जवाब मिलता है कि नया कनेक्शन अभी नहीं मिलेगा। जनहित में अब मांग उठ रही है कि शासन-प्रशासन तत्काल संज्ञान लेकर इस आवंटन प्रक्रिया को शुरू कराए ताकि मध्यमवर्ग को राहत मिल सके।

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