वर्षों से गैरहाजिर डॉक्टर के नाम पर कट रही पर्ची,केवल क्लिनिक और मेडिकल-लैब पार्टनरशिप में बिजी,प्रशासनिक शह पर चल रहा खेल
Junaid Khan - शहडोल। जिला अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं की आड़ में चल रहे एक बड़े और संगठित खेल का भंडाफोड़ हुआ है। सरकारी ड्यूटी से नदारद रहकर केवल अपनी निजी प्रैक्टिस, मेडिकल स्टोर और पैथोलॉजी लैब का नेटवर्क चलाने वाले डॉक्टरों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई न होना पूरे जिला प्रशासन और अस्पताल प्रबंधन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करता है। हाल ही में 16 अक्टूबर 2026 की एक भर्ती पर्ची (IPD ID 260041720) सामने आई है, जिसमें वर्षों से अस्पताल में अनुपस्थित बताए जा रहे डॉ. धर्मेंद्र द्विवेदी का नाम दर्ज है। जब डॉक्टर साहब अस्पताल परिसर में मरीजों को देखने आते ही नहीं, तो उनके नाम की भर्ती पर्ची काटकर किसे और किस आधार पर गुमराह किया जा रहा है? सूत्रों के मुताबिक, यह कोई पहला या इकलौता मामला नहीं है, बल्कि वर्षों से अपने चहेते कर्मचारियों के दम पर फर्जी हाजिरी लगाने और सरकारी खजाने से नियमित वेतन डकारने का यह धड़ल्ले से एक आदतन जरिया बन चुका है। सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, उक्त डॉक्टर का यह रवैया सालों पुराना है। जिला अस्पताल में अपनी ड्यूटी सिर्फ रस्म अदायगी या फर्जी हाजिरी तक सीमित रखने वाले डॉक्टर साहब का पूरा ध्यान गायत्री मंदिर के सामने स्थित अपने निजी क्लिनिक को चलाने में रहता है। इतना ही नहीं, पर्दे के पीछे से एक मेडिकल स्टोर में पार्टनरशिप और आसपास ही एक पैथोलॉजी लैब संचालित कराने में भी इनकी गहरी संलिप्तता बताई जा रही है। सरकारी अस्पताल में आने वाले असहाय और गरीब मरीजों का इलाज करने के बजाय उन्हें अपने निजी नेटवर्क की ओर धकेलना और सरकारी सुविधाओं को ताक पर रखकर अपनी तिजोरी भरना इनकी दिनचर्या बन चुकी है। सवाल यह उठता है कि क्या अस्पताल परिसर में दिन-रात बैठने वाले जिम्मेदार अधिकारियों को इस समानांतर नेटवर्क और वर्षों से जारी इस 'अदृश्य' डॉक्टर की करतूतों की तनिक भी भनक नहीं है? जब भी ऐसा कोई संगीन मामला मीडिया या जनता के माध्यम से उजागर होता है, तो जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी "जांच करवाएंगे", "यह लिपिकीय त्रुटि है" या "कार्रवाई की जाएगी" जैसे रटे-रटाए बयान देकर इतिश्री कर लेते हैं। सिविल सर्जन डॉ. शिल्पी सराफ का यह कहना कि पर्ची पर नाम नहीं आना चाहिए और जांच कराई जाएगी, केवल अपना पल्ला झाड़ने का एक पारंपरिक तरीका नजर आता है। हकीकत तो यह है कि बिना वरिष्ठ अधिकारियों, सिविल सर्जन, सीएमएचओ (CMHO) और अस्पताल प्रबंधकों की शह व 'मौन सहमति' के इतना बड़ा फर्जीवाड़ा सालों-साल तक नहीं चल सकता। सूत्रों का दावा है कि निजी क्लिनिकों, मेडिकल स्टोरों और पैथोलॉजी सेंटरों से मिलने वाले मोटे कमीशन और नजराने की आँच ऊपर तक पहुँचती है, जिसके कारण जांच के नाम पर हमेशा कागजी खानापूर्ति कर फाइलें दबा दी जाती हैं। जिला अस्पताल में व्याप्त यह भ्रष्टाचार केवल एक डॉक्टर तक सीमित नहीं है, बल्कि कई डॉक्टर चंद मिनट हाजिरी बजाकर निजी क्लिनिकों के लिए रवाना हो जाते हैं। स्थानीय अधिकारियों के इस ढुलमुल और लीपापोती वाले रवैये को देखते हुए अब इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच की सख्त दरकार है। भोपाल में बैठे स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों, स्वास्थ्य मंत्री और मुख्यमंत्री (CM) को इस मामले का सीधा संज्ञान लेना चाहिए। यदि उच्च स्तरीय दल भेजकर जिला अस्पताल के बायोमेट्रिक व उपस्थिति रजिस्टर, सीसीटीवी (CCTV) फुटेज और निजी क्लिनिकों के समय की निष्पक्ष जांच करा ली जाए, तो पूरे स्वास्थ्य महकमे में जारी इस संगठित साठगांठ का दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। अब देखना यह है कि शासन-प्रशासन इस फर्जीवाड़े पर बुलडोजर चलाता है या फिर कागजी बयानों के सहारे भ्रष्ट गठजोड़ को संरक्षण देना जारी रखता है।
