दावों की खुली पोल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की उदासीनता उजागर,शासकीय व्यवस्थाओं के बजाय चंदे से पहुंचा पार्थिव शरीर घर
Junaid khan - शहडोल। मध्य प्रदेश में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, त्वरित एम्बुलेंस सुविधाओं और निर्धन परिवारों की मदद के सरकार व जिला प्रशासन के बड़े-बड़े दावे धरातल पर पूरी तरह खोखले साबित हो रहे हैं। शहडोल मेडिकल कॉलेज परिसर से एक ऐसा हृदयविदारक मामला सामने आया है जिसने शासकीय दावों और स्वास्थ्य विभाग के लचर ढर्रे की पोल खोल कर रख दी है। यहां मंगलवार की तड़के करीब 5 बजे एक मरीज की मौत हो गई, लेकिन जेब खाली होने और एम्बुलेंस का मनमाना किराया चुकाने में असमर्थ होने के कारण गरीब परिवार को अपने स्वजन का पार्थिव शरीर गृह ग्राम चंदिया (उमरिया) ले जाने के लिए सुबह 5 बजे से लेकर शाम 5:30 बजे तक, यानी पूरे 12 घंटे तक अस्पताल परिसर में सिसकते हुए इंतजार करना पड़ा। शासकीय तंत्र लाचार, निजी एम्बुलेंस वालों की मनमानी यह पूरी घटना स्वास्थ्य महकमे, मेडिकल कॉलेज प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन के मुंह पर तमाचा है। सवाल यह उठता है कि संकट के समय सरकारी स्तर पर मिलने वाली शव वाहन और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं कहां गुम थीं? आखिर क्यों एक असहाय परिवार को 12 घंटे तक अपनों के शव के पास बैठकर सिर्फ रोने और किसी चमत्कार की उम्मीद करने पर मजबूर होना पड़ा? सिस्टम की इस घोर लापरवाही और उदासीनता के कारण गरीब परिवार दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर रहा, जबकि जिम्मेदार अधिकारी अपनी कुंभकर्णी नींद में सोए रहे। डॉक्टरों ने आपस में चंदा इकट्ठा कर पहुंचाया शव, उठ रहे गंभीर सवाल इस पूरे घटनाक्रम में भले ही डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ ने इंसानियत का परिचय देते हुए आपस में चंदा जमा किया और किराए का इंतजाम कर पार्थिव शरीर को पूरे सम्मान के साथ चंदिया के लिए रवाना किया, लेकिन इस मानवीय पहल के पीछे शासकीय व्यवस्था की बदहाली साफ़ नजर आती है। जब स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन के पास ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए बजट और साधन उपलब्ध हैं, तो फिर किसी गरीब को चंदे के भरोसे क्यों निर्भर रहना पड़ रहा है? वरिष्ठ अधिकारियों और जिला प्रशासन को इस गंभीर लापरवाही का कड़ा संज्ञान लेना चाहिए तथा संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करते हुए ठोस कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी लाचार परिवार को इस तरह बेबसी के आंसू न बहाने पड़ें।
