मासूम पर सितम,रसूख के साये में 'इंसाफ' की रफ्तार धीमी

डॉक्टर की पत्नी पर प्रताड़ना का केस दर्ज,पर स्वास्थ्य विभाग और पुलिस-प्रशासन के ढुलमुल रवैये से उठ रहे गंभीर सवाल


Junaid Khan - शहडोल। कोतवाली थाना क्षेत्र के वार्ड-7 (पाण्डवनगर) में 8 वर्ष की मासूम बालिका से बंधुआ मजदूर की तरह घरेलू काम कराने, बात न मानने पर बेरहमी से मारपीट करने और गर्म चिमटे से दागने का रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला सामने आया है। पुलिस ने आरोपी महिला शांति उर्फ गुड़िया प्रजापति (पति बी. आर. प्रजापति, निवासी वार्ड-7, पाण्डवनगर) के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115(2), 118(1), किशोर न्याय अधिनियम 2015 की धारा 75 और बाल श्रम अधिनियम 1986 की धारा 14(1) के तहत मामला तो दर्ज कर लिया है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन और पुलिस की शुरुआती कार्यप्रणाली को लेकर शहर में गहरा आक्रोश पनप रहा है। आरोप है कि जिला चिकित्सालय में पदस्थ डॉक्टर दंपत्ति के रसूख और प्रभाव के कारण मामले में त्वरित और कड़ी कार्रवाई करने के बजाय कागजी औपचारिकताओं व रिपोर्टों का इंतजार कर लीपापोती की गुंजाइश तलाशी जा रही है।

04 महीने से चल रहा था प्रताड़ना का खेल,बांदा से मंगावाई SIR रिपोर्ट

जांच में खुलासा हुआ है कि करीब चार महीने पहले मासूम बच्ची को उसकी सहेली के साथ खेलने और रहने के बहाने परिजनों की सहमति से शहडोल लाया गया था। लेकिन धीरे-धीरे उससे क्षमता से अधिक घरेलू काम कराया जाने लगा और मना करने या काम में थोड़ी सी भी चूक होने पर बेरहमी से पीटा जाता था। हद तो तब हो गई जब बच्ची को गर्म चिमटे से दागा गया और किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दी गई। 30 सितंबर को जब प्रताड़ना असहनीय हो गई, तो बच्ची किसी तरह भागकर पड़ोसियों के पास पहुंची, जिसके बाद डायल-112 की मदद से पुलिस ने उसे संरक्षण में लिया। फिलहाल बाल कल्याण समिति (CWC) ने बच्ची को बाल शिशु गृह शहडोल में सुरक्षित रखा है। समिति की अध्यक्ष कल्याणी बाजपेयी के अनुसार, मामले में बांदा (उ.प्र.) से सामाजिक जांच रिपोर्ट (SIR) मंगवाई गई है, जिसके 5-6 दिनों में आने की संभावना है। रिपोर्ट मिलने के बाद आगे की वैधानिक प्रक्रिया तय होगी।

 प्रशासनिक संरक्षण व स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी पर सवाल

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग और पुलिस-प्रशासन की भूमिका को लेकर उठ रहा है। आरोपी महिला के पति जो कि खुद जिला अस्पताल में डॉक्टर हैं, के विभागीय प्रभाव के चलते क्या प्रशासनिक तंत्र दबाव में काम कर रहा है? बाल कल्याण समिति के समक्ष बार-बार बुलाए जाने के बावजूद डॉक्टर दंपत्ति का उपस्थित न होना यह स्पष्ट करता है कि कानून और व्यवस्था को लेकर उनके मन में कोई डर नहीं है। वहीं, बच्ची के चिकित्सीय परीक्षण (मेडीकल रिपोर्ट) में आ रही देरी और पुलिस द्वारा आरोपियों पर अब तक सख्त रुख न अपनाना कई गंभीर संदेह पैदा करता है। स्थानीय नागरिकों और बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब एक मासूम बच्ची के शरीर पर जलने और मारपीट के स्पष्ट निशान मौजूद हैं, तब भी रसूखदारों को बचाने के लिए ढिलाई बरती जा रही है। यदि वरिष्ठ अधिकारियों ने तुरंत संज्ञान लेकर डॉक्टर दंपत्ति पर कड़ी कानूनी और विभागीय कार्रवाई नहीं की, तो यह मामला सीधे तौर पर शासन-प्रशासन की साख पर बड़ा धब्बा साबित होगा।

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