बिना डिलीवरी पैसे काटने वाली कंपनी पर ठुका हर्जाना,अधिकारियों पर भी सवाल
Junaid khan - शहडोल। बुढ़ार अक्सर ऑनलाइन शॉपिंग और निजी कंपनियों के लुभावने विज्ञापनों के जाल में फंसकर आम उपभोक्ता ठगी और मानसिक प्रताड़ना का शिकार होते रहते हैं। लेकिन जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, शहडोल ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है जिसने मनमानी करने वाली निजी कंपनियों और उदासीन रवैया अपनाने वाले जिम्मेदार प्रशासनिक तंत्र को करारा सबक सिखाया है। मामला ऑनलाइन ऑर्डर किए गए मोबाइल की डिलीवरी न देने और उल्टे उपभोक्ता के पैसे में से ₹999 की अवैध कटौती करने का है। उपभोक्ता आयोग ने इसे अनुचित व्यापार व्यवहार (अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस) मानते हुए कंपनी को काटी गई ₹999 की राशि 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटाने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही, उपभोक्ता को हुई मानसिक क्षति और कानूनी खर्च की भरपाई के लिए ₹5,000 का अतिरिक्त हर्जाना भी कंपनी पर ठोका है। यह फैसला उन सभी लापरवाह कंपनियों के लिए एक कड़ी चेतावनी है जो ग्राहकों की मजबूरी और तकनीकी कमियों का फायदा उठाकर उनकी मेहनत की कमाई पर डाका डालती हैं।
क्या था पूरा मामला और कंपनी का गैर-जिम्मेदाराना रवैया?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, परिवादी रीना छाबड़ा ने 19,474 रुपये की कीमत का एक मोबाइल ऑनलाइन ऑर्डर किया था। प्रक्रिया के दौरान मोबाइल नंबर में लिपिकीय त्रुटि (गलत नंबर दर्ज) हो गई थी। उपभोक्ता रीना ने सजगता दिखाते हुए तुरंत कंपनी के कस्टमर केयर से संपर्क किया और नंबर में सुधार/अपडेट करने का विनम्र आग्रह किया। लेकिन अपनी सेवाओं का ढिंढोरा पीटने वाली इस कंपनी के गैर-जिम्मेदार तंत्र ने नंबर अपडेट करने से साफ इनकार कर दिया। नतीजा यह हुआ कि फोन की डिलीवरी ग्राहक तक पहुँची ही नहीं। हद तो तब हो गई जब कंपनी ने ऑर्डर रद्द न होने के बावजूद खुद की नाकामी का ठीकरा उपभोक्ता के सिर फोड़ते हुए 999 रुपये काट लिए और महज 18,475 रुपये ही वापस लौटाए। कंपनी की इस मनमानी और अड़ियल रवैये से आहत होकर पीड़िता ने उपभोक्ता आयोग में कानूनी शरण ली। मामले में अधिवक्ता इंदर पाल सिंह छाबड़ा ने उपभोक्ता के पक्ष में पुरजोर पैरवी करते हुए कंपनी की अवैध कटौती और सेवा में कमी को आयोग के समक्ष तथ्यात्मक रूप से रखा। आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद कंपनी की कटौती को नियमों के सर्वथा विरुद्ध और अनुचित ठहराते हुए यह फैसला सुनाया।
प्रशासनिक सुस्ती और उपभोक्ता संरक्षण महकमे पर भी उठते सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने जिला प्रशासन और खाद्य व उपभोक्ता संरक्षण विभाग के स्थानीय अधिकारियों की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब निजी कंपनियाँ इस तरह खुलेआम ग्राहकों का शोषण करती हैं, तब जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी और शिकायत निवारण तंत्र क्यों मौन बैठा रहता है? स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियानों और सख्त निगरानी के अभाव में रोजाना सैकड़ों भोले-भाले नागरिक ऑनलाइन और ऑफलाइन ठगी के शिकार हो रहे हैं। प्रशासन का फर्ज बनता है कि वह ऐसे फर्जी और गैर-जिम्मेदार कॉरपोरेट घरानों के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेकर दंडात्मक कार्रवाई करे ताकि आम नागरिक को अदालत के चक्कर न काटने पड़ें। यह फैसला जहाँ एक ओर पीड़ित रीना छाबड़ा के जुझारूपन की जीत है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभाग के सुस्त अधिकारियों के मुंह पर एक तमाचा भी है कि वे अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन केवल कागजों तक ही सीमित न रखें। जागरूक नागरिकों का कहना है कि प्रशासन को ऐसी कंपनियों को ब्लैकलिस्ट करने और उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा के लिए धरातल पर ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
