जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए अब दफ्तर से कोर्ट तक दौड़

एक साल की देरी पर मजिस्ट्रेट की मंजूरी, दो साल बाद न्यायिक आदेश अनिवार्य


Junaid Khan - शहडोल। जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने में देरी अब आम लोगों के लिए भारी पड़ सकती है। जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण (संशोधन) अधिनियम, 2026 के लागू होने के बाद विलंबित पंजीयन की प्रक्रिया सख्त कर दी गई है। अब घटना के एक साल बाद पंजीयन कराने पर मजिस्ट्रेट का आदेश और दो साल से अधिक देरी होने पर प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश जरूरी होगा। आर्थिक एवं सांख्यिकी संचालनालय, मध्यप्रदेश ने सभी कलेक्टर एवं अतिरिक्त मुख्य रजिस्ट्रार (जन्म-मृत्यु) को इस संबंध में निर्देश जारी किए हैं। संशोधित प्रावधान अक्टूबर 2026 से प्रभावी किए गए हैं। इसके साथ ही अधिनियम की धारा 13(3) के तहत विलंबित पंजीयन के लिए सक्षम प्राधिकारी भी तय कर दिए गए हैं।

एक साल बाद सीधे पंजीयन नहीं

जन्म या मृत्यु की सूचना यदि घटना के एक साल बाद, लेकिन दो साल के भीतर दी जाती है तो रजिस्ट्रार सीधे पंजीयन नहीं कर सकेगा। इसके लिए जिला मजिस्ट्रेट, अनुविभागीय मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अधिकृत कार्यपालिक मजिस्ट्रेट का आदेश लेना होगा। आदेश मिलने के बाद ही पंजीयन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

दो साल बाद कोर्ट की शरण

घटना को दो साल से अधिक समय बीत जाने पर आवेदक को प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश की जरूरत होगी। यानी लंबे समय से लंबित जन्म या मृत्यु प्रमाण पत्र अब केवल रजिस्ट्रार कार्यालय में आवेदन देकर नहीं बन सकेगा। दस्तावेजों की जांच और न्यायालयीन प्रक्रिया के बाद ही पंजीयन का रास्ता खुलेगा।

जरूरत के वक्त बढ़ेगी परेशानी

जन्म प्रमाण पत्र बच्चों के स्कूल प्रवेश, पहचान और सरकारी योजनाओं के लिए जरूरी है। वहीं मृत्यु प्रमाण पत्र के बिना बैंक खाते, बीमा, उत्तराधिकार, संपत्ति हस्तांतरण और अन्य कानूनी काम अटक सकते हैं। ऐसे में तत्काल प्रमाण पत्र की जरूरत वाले परिवारों के सामने नई व्यवस्था परेशानी खड़ी कर सकती है। खासकर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को दस्तावेज जुटाने से लेकर मजिस्ट्रेट अथवा न्यायालय तक पहुंचने में अतिरिक्त समय और खर्च उठाना पड़ सकता है। कई मामलों में कार्यालयों के साथ न्यायालय के चक्कर भी लगाने की नौबत आ सकती है।

दस्तावेज हैं तो प्रक्रिया हो सरल

लोगों का कहना है कि यदि अस्पताल का रिकॉर्ड, ग्राम पंचायत या नगरीय निकाय का प्रमाण, स्कूल अभिलेख अथवा अन्य विश्वसनीय दस्तावेज उपलब्ध हैं तो ऐसे मामलों का त्वरित सत्यापन किया जाना चाहिए। केवल देरी के आधार पर आवेदक को लंबी प्रक्रिया में उलझाने के बजाय स्पष्ट समयसीमा में निराकरण की व्यवस्था जरूरी है।

नियम सख्त,व्यवस्था सरल हो

विलंबित पंजीयन में फर्जीवाड़ा रोकने के लिए जांच जरूरी है, लेकिन प्रक्रिया इतनी जटिल भी नहीं होनी चाहिए कि जरूरतमंद को प्रमाण पत्र के लिए महीनों तक भटकना पड़े। लोगों की मांग है कि विलंबित पंजीयन के लिए ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल दस्तावेज सत्यापन और समयबद्ध निपटारे की व्यवस्था की जाए, ताकि नियमों का पालन भी हो और आम नागरिक को दफ्तर से कोर्ट तक की दौड़ न लगानी पड़े।

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