रेलवे के सौंदर्यीकरण के दावों की खुली पोल, रैंप जैसी बुनियादी सुविधा न होने से यात्रियों की जान जोखिम में
Junaid Khan - शहडोल। रेलवे प्रशासन भले ही स्टेशन परिसर को चकाचक चमकाने और यात्री सुविधाओं के विस्तार के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने का दंभ भर रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत और बेहद संवेदनहीन नजर आ रही है। स्टेशन की नई बिछी टाइल्स और जगमगाती लाइटों के पीछे की कड़वी सच्चाई यह है कि गंभीर रूप से बीमार और दिव्यांग यात्रियों के लिए यहां एक अदद रैंप तक मय्यसर नहीं है। हाल ही में सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे एक दर्दनाक वीडियो ने रेलवे के इन तमाम विकास दावों और यात्री सुरक्षा की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। वायरल वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि पैर में गंभीर फ्रैक्चर से जूझ रहे एक मरीज को व्हीलचेयर पर बैठाकर रेलवे ट्रैक के बीचों-बीच गिट्टियों और लोहे की पटरियों के जोखिम भरे रास्ते से ले जाया जा रहा है। घटना शहडोल निवासी मोहम्मद सैय्यद की है, जिन्हें पैर टूटने के कारण बेहतर इलाज के लिए जबलपुर जाना था। परिजन जब उन्हें ट्रेन पकड़वाने के लिए स्टेशन पहुंचे, तो प्लेटफॉर्म बदलने या एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाने के लिए रैंप न होने के कारण वे असहाय नजर आए। लिफ्ट व ओवरब्रिज की अव्यवस्थित स्थिति और सुगम मार्ग की गैरमौजूदगी में मजबूरीवश परिजनों को व्हीलचेयर को ही पटरियों के बीच उबड़-खाबड़ गिट्टियों पर घसीटना पड़ा। इस बेहद खतरनाक और जानलेवा स्थिति का किसी जागरूक नागरिक ने वीडियो बनाकर इंटरनेट पर साझा कर दिया। इसके बाद से ही पूरे प्रशासनिक अमले और रेल महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। आम जनमानस में भी इस संवेदनहीनता को लेकर भारी रोष देखा जा रहा है। स्थानीय नागरिकों और यात्री यूनियनों का कहना है कि शहडोल संभाग के प्रमुख रेलवे स्टेशन पर रैंप निर्माण की मांग लंबे समय से की जा रही है, लेकिन रेल महकमे के जिम्मेदार अधिकारी लगातार बजट और योजनाओं का बहाना बनाकर आंखें मूंदे बैठे हैं। आलम यह है कि हर रोज बीमार, बुजुर्ग और दिव्यांग यात्रियों को प्लेटफॉर्म तक पहुंचने के लिए अपनों की गोद, पीठ या ऐसे ही जोखिम भरे तरीकों का सहारा लेना पड़ता है। करोड़ों के बजट की चमक-धमक के बीच इस बुनियादी जरूरत की अनदेखी सीधे तौर पर रेलवे बोर्ड, संबंधित मंडल रेल प्रबंधक (DRM) और स्थानीय स्टेशन प्रबंधन की घोर लापरवाही को उजागर करती है। यह घटना न सिर्फ यात्री सुविधाओं पर गहरा आघात है, बल्कि रेलवे सुरक्षा नियमों का भी खुला उल्लंघन है, जहां एक मरीज को पटरियों के बीच से ले जाने की नौबत आ गई। सवाल यह उठता है कि क्या रेल प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारी किसी बड़े हादसे या अनहोनी का इंतजार कर रहे हैं? अगर पटरियों के बीच व्हीलचेयर ले जाते समय कोई मालगाड़ी या एक्सप्रेस ट्रेन आ जाती, तो इस गंभीर लापरवाही का जवाबदेह कौन होता? फिलहाल इस वायरल वीडियो ने केंद्रीय रेल मंत्रालय से लेकर स्थानीय स्टेशन प्रशासन तक की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अब देखना यह होगा कि इस फजीहत के बाद जिम्मेदार रेल अधिकारी केवल बयानबाजी करते हैं या जमीनी स्तर पर मरीजों व दिव्यांगों के लिए अविलंब रैंप की व्यवस्था सुनिश्चित करते हैं।
