कंपनी में वाहन अटैच कराने के नाम पर ऐंठे 30 हजार और दस्तावेज, शिकायत के बाद भी ठोस कार्रवाई न होना व्यवस्था पर खड़ा कर रहा गंभीर सवाल
Junaid Khan - शहडोल। जिले में अपराधियों और दबंगों के हौसले किस कदर बुलंद हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण सोहागपुर थाना क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। सरकार और पुलिस-प्रशासन भले ही आदिवासियों के संरक्षण और न्याय दिलाने के बड़े-बड़े दावे करते हों, लेकिन धरातल पर दबंगों का बोलबाला कायम है। पीड़ित रामकुमार बैगा (निवासी ग्राम मैकी) ने अनूपपुर जिले के जैतहरी स्थित मोजर बेयर कंपनी में चार पहिया गाड़ी अटैच करवाने के नाम पर ठगी का शिकार होने के बाद न्याय की गुहार लगाई है। कोटमा निवासी आरोपी अनुराग मिश्रा (उम्र 40 वर्ष) ने अपनी पुरानी जान-पहचान और कंपनी में अपनी तथाकथित तगड़ी पहुंच का झांसा देकर पीड़ित से 30 हजार रुपये नकद, रजिस्ट्रेशन कार्ड, बीमा और दो पासपोर्ट साइज फोटो ऐंठ लिए। महीनों बीत जाने के बाद भी न तो गाड़ी लगी और न ही पैसे वापस मिले। जब पीड़ित अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा मांगने पहुंचा, तो उसे सिर्फ टालमटोल और अपमान ही हाथ लगा।
धमकियां और जातिसूचक गालियां,फिर भी खाकी का रुख सुस्त
मामला सिर्फ ठगी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आरोपी की गुंडागर्दी और दबंगई इस कदर बढ़ गई कि उसने 30 सितंबर की रात फोन पर पीड़ित बैगा आदिवासी को खुलेआम जातिसूचक गालियां दीं और जान से मारने की धमकी दे डाली। आरोपी ने साफ शब्दों में पुलिस का खौफ दरकिनार करते हुए कह दिया कि "तेरा पैसा वापस नहीं करूंगा, जो करना हो कर ले"। इस तरह खुलेआम एक आदिवासी को प्रताड़ित किए जाने और धमकी दिए जाने के बावजूद सोहागपुर थाना और अजक (अजाक) थाने में शिकायत दर्ज होने के बाद भी प्रशासनिक सुस्ती यह दर्शाती है कि जिम्मेदार अधिकारी मामलों को किस कदर हल्के में ले रहे हैं। यदि दबंगों पर समय रहते शिकंजा नहीं कसा जाता, तो यह पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली और कानून-व्यवस्था के इकबाल पर सीधा प्रहार है।
जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी पर उठ रहे सवाल, अब सख्त कार्रवाई का इंतजार
पीड़ित रामकुमार बैगा ने 1 अक्टूबर को सोहागपुर थाने और अजाक थाने में आरोपी अनुराग मिश्रा के खिलाफ धोखाधड़ी, अमानत में खयानत, गाली-गलौज और सख्त धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज कर कठोर दंडात्मक कार्रवाई की लिखित गुहार लगाई है। हालांकि, अब देखना यह होगा कि सोहागपुर पुलिस थाना प्रभारी, अजाक थाना प्रभारी और शहडोल पुलिस अधीक्षक (SP) इस गंभीर मामले में क्या रुख अपनाते हैं। क्या आदिवासी समुदाय के पीड़ित को उसकी मेहनत की कमाई के 30 हजार रुपये वापस मिलेंगे? या फिर प्रशासनिक शिथिलता के कारण आरोपी खुलेआम घूमता रहेगा? यदि जिम्मेदार अधिकारियों ने मामले को गंभीरता से लेकर आरोपी की तुरंत गिरफ्तारी नहीं की, तो शासन-प्रशासन की निष्पक्षता और आदिवासी हितैषी होने के दावों की पोल खुलना तय है।
