शहडोल में ‘एंटीबायोटिक अराजकता’ बिना पर्ची बिक रहीं दवाएं, निगरानी तंत्र नदारद; मानव शरीर पर मंडरा रहा बड़ा खतरा
Junaid khan - शहडोल। जिले में एंटीबायोटिक दवाओं की ओटीसी (बिना डॉक्टर की पर्ची) बिक्री पर रोक लगाने को लेकर स्वास्थ्य विभाग अब तक कोई ठोस और प्रभावी पहल नहीं कर पाया है। केंद्र सरकार की स्पष्ट गाइडलाइन होने के बावजूद जिले में उसका पालन कराने वाला अमला ही मौजूद नहीं है। इसका सीधा असर आम लोगों की सेहत पर पड़ रहा है और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जैसे गंभीर खतरे की आशंका दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। जिले में औषधि निरीक्षक ही नहीं, कैसे होगी कार्रवाई? स्वास्थ्य विभाग के तहत औषधि निरीक्षक को दवा दुकानों के लाइसेंस, दवाओं की गुणवत्ता और नियमों के पालन की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि संभागीय मुख्यालय शहडोल में एक भी औषधि निरीक्षक पदस्थ नहीं है। वर्तमान में अनूपपुर जिले में पदस्थ औषधि निरीक्षक को शहडोल का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। पहले भी यहां पदस्थ रहे औषधि निरीक्षकों के पास कई जिलों का प्रभार रहा, जिससे वे महीने में एक-दो बार ही जिले का दौरा कर पाते थे। निगरानी के अभाव में फल-फूल रहा अवैध कारोबार कई वर्षों से दवा दुकानों की निगरानी व्यवस्था पूरी तरह ढीली पड़ी हुई है। इसका नतीजा यह है कि जिले में अनेक ऐसे दवा विक्रेता सक्रिय हैं, जो किसी दूसरे के नाम के लाइसेंस पर कारोबार कर रहे हैं। बिना डॉक्टर की पर्ची के एंटीबायोटिक, स्टेरॉयड और अन्य खतरनाक दवाइयां धड़ल्ले से बेची जा रही हैं। सर्दी-जुकाम, बुखार जैसी सामान्य बीमारियों में भी दुकानदार अपने हिसाब से डोज तय कर एंटीबायोटिक थमा रहे हैं, जो भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य संकट को जन्म दे सकता है। ग्रामीण इलाकों में ‘फर्जी इलाज’ का बोलबाला ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी चिंताजनक है। बिना डिग्रीधारी तथाकथित डॉक्टर क्लीनिक चला रहे हैं और मरीजों को अंधाधुंध एंटीबायोटिक देकर मनमानी फीस वसूल रहे हैं। मरीजों को न तो यह बताया जाता है कि दवा क्यों दी जा रही है, न इसके फायदे-नुकसान समझाए जाते हैं। कमीशन का खेल, मरीज बन रहे कर्जदार शहर में निजी क्लीनिक संचालित करने वाले कई डॉक्टरों पर दवा दुकानों से कमीशन लेने के आरोप भी सामने आ रहे हैं। सामान्य बीमारी में भी जरूरत से ज्यादा दवाएं लिखी जाती हैं, जिनमें महंगी एंटीबायोटिक शामिल रहती हैं। इसका आर्थिक बोझ सीधे मरीज पर पड़ता है और कई बार गरीब मरीज इलाज के बाद कर्जदार बन जाता है। जन-जागरूकता शून्य, मरीज अनजान स्वास्थ्य विभाग द्वारा कार्यशालाओं और विभागीय बैठकों में कर्मचारियों व डॉक्टरों को गाइडलाइन के अनुसार एंटीबायोटिक उपयोग की जानकारी दी जाती है, लेकिन आम जनता को जागरूक करने के लिए कोई ठोस अभियान नहीं चलाया जा रहा है। अधिकांश मरीजों को यह तक नहीं पता कि एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल भविष्य में किस तरह जानलेवा साबित हो सकता है। जिम्मेदारी तय, पर संसाधन नहीं जिला अस्पताल में आवश्यकता अनुसार एंटीबायोटिक डोज दिए जाने का दावा किया जा रहा है, लेकिन निजी क्षेत्र में स्थिति नियंत्रण से बाहर बताई जा रही है। औषधि नियंत्रक विभाग की जिम्मेदारी दवा दुकानों पर कार्रवाई की है, पर संसाधनों और अमले के अभाव में यह जिम्मेदारी कागजों तक सीमित रह गई है। क्या कहते हैं जिम्मेदार अधिकारी स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि एंटीबायोटिक उपयोग को लेकर केंद्र सरकार की गाइडलाइन मौजूद है और हर साल अभियान के दौरान डॉक्टरों को सतर्क किया जाता है। हालांकि, विभाग ने अब तक कोई अतिरिक्त संसाधन नहीं लगाया है, जिसके कारण जिले में ओटीसी बिक्री पर प्रभावी कार्रवाई संभव नहीं हो पा रही है। बड़ा सवाल कब जागेगा सिस्टम? बिना पर्ची बिकती एंटीबायोटिक सिर्फ कानून व्यवस्था की नहीं, बल्कि आने वाले समय में बड़े स्वास्थ्य संकट की चेतावनी है। यदि समय रहते निगरानी तंत्र मजबूत नहीं किया गया और अवैध बिक्री पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो इसके दुष्परिणाम पूरे समाज को भुगतने पड़ सकते हैं।
