संवैधानिक अधिकारों पर प्रहार के खिलाफ शहडोल में फूटा आक्रोश: राष्ट्रपति के नाम कलेक्टर को सौंपा 11 सूत्रीय महा-ज्ञापन
Junaid Khan - शहडोल। देश में वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य के बीच धर्मनिरपेक्षता, आपसी सौहार्द और नागरिक समानता के मूल सिद्धांतों पर लगातार हो रहे आघातों के खिलाफ अब प्रांतीय स्तर पर आक्रोश सुलगने लगा है। शहडोल जिला मुख्यालय पर आज भारत मुक्ति मोर्चा एवं राष्ट्रीय मुस्लिम मोर्चा के संयुक्त तत्वावधान में एक विशाल विरोध प्रदर्शन करते हुए देश की महामहिम राष्ट्रपति के नाम जिला प्रशासन (कलेक्टर) को 11 सूत्रीय एक बेहद तल्ख और ऐतिहासिक ज्ञापन सौंपा गया। इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे राष्ट्रीय मुस्लिम मोर्चा के जिला अध्यक्ष मोहम्मद यासीन खान ने प्रशासनिक तंत्र और तानाशाही रवैया अपना रहे नीति-निर्धारकों को सीधे शब्दों में चेतावनी दी कि यदि अल्पसंख्यकों, दलितों और पिछड़ों के संवैधानिक अधिकारों से छेड़छाड़ बंद नहीं हुई, तो यह शांतिपूर्ण आंदोलन देशव्यापी जनाक्रोश में बदल जाएगा। सौंपे गए ज्ञापन में हाल ही में सामने आए मॉब लिंचिंग के मामलों, फर्जी गौकशी के नाम पर होने वाले उत्पीड़न और चलती ट्रेन में बिहार के मुफ्ती तौसीफ रजा की नृशंस हत्या जैसी घटनाओं पर त्वरित और कठोर दंडात्मक कार्रवाई की मांग की गई है।
संविधान विरोधी कानूनों को वापस लेने की हुंकार, 'वक्फ संशोधन-2025' और 'UCC' पर तीखा प्रहार मोर्चे द्वारा सौंपे गए इस महा-ज्ञापन में सरकार की विभाजनकारी नीतियों को सीधे तौर पर आड़े हाथों लिया गया है। आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया कि सीएए (CAA), समान नागरिक संहिता (UCC) और वक्फ संशोधन अधिनियम-2025 जैसे कानून देश के मूल संवैधानिक ढांचे और बहुलतावादी पहचान पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगाते हैं, जिन्हें तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाना चाहिए। ज्ञापन में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25, 26, 27, 28 और 29 का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करने की मांग की गई है, जो प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता और अपनी संस्कृति के संरक्षण का अधिकार देते हैं। इसके साथ ही, प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 (धार्मिक स्थल कानून) को कड़ाई से लागू करने की वकालत करते हुए कहा गया कि 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस स्थिति में थे, उनके स्वरूप को बदलने की प्रशासनिक या राजनीतिक साजिशों पर पूर्ण विराम लगाया जाए। जातिगत जनगणना और आरक्षण की पाबंदी हटाने की मांग; सांप्रदायिक नफरत फैलाने वाले संगठनों पर बैन की पैरवी
इस बड़े प्रशासनिक हस्तक्षेप के माध्यम से मोर्चे ने सामाजिक न्याय की एक नई बहस को भी हवा दे दी है। मांग की गई है कि देश की सभी जातियों और वर्गों की जाति आधारित गिनती (Caste Census) कराकर जनसंख्या के सटीक अनुपात में शासन-प्रशासन, शिक्षा और रोजगार में एससी (SC), एसटी (ST), ओबीसी (OBC) और माइनॉरिटी (अल्पसंख्यक) समाज को आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिया जाए। इसके अलावा, अनुच्छेद-341(3) के तहत लगी कथित असंवैधानिक पाबंदी को हटाकर धर्म के आधार पर आरक्षण से वंचित करने की व्यवस्था को समाप्त करने की पुरजोर मांग उठाई गई। गोपाल सिंह, सच्चर, मिश्रा और कुंडू कमीशन की लंबित सिफारिशों को बिना किसी देरी के लागू करने की चेतावनी देते हुए वक्ताओं ने कहा कि देश में सांप्रदायिक नफरत और जहर घोलने वाले संगठनों को तत्काल प्रभाव से कानून के दायरे में लाकर प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।
ये रहे मौजूद: एकजुटता दिखाकर दी व्यवस्था को चुनौती प्रशासन के गलियारों को कड़ा संदेश देने वाले इस प्रदर्शन और ज्ञापन सौंपने के दौरान मुख्य रूप से जिला अध्यक्ष मोहम्मद यासीन खान के साथ मोहम्मद कादिर खान, मोबीन खान, मोहम्मद नूर खान, बेटू खान, रफीक खान, शफात अंसारी, मोहम्मद रहीम खान, मोहम्मद रफीक मंसूरी, विवेक, संतोष कुशवाहा, मोहम्मद फिरोज अंसारी, असलम अंसारी, इमरान अंसारी, फिरोज खान, सुहेल खान, मोहम्मद आबिद हसन, शेखर खान, मोहम्मद फुरकान खान, अली अहमद और मोहम्मद उस्मान सहित भारी संख्या में प्रबुद्ध नागरिक और मोर्चा के पदाधिकारी उपस्थित रहे। इन सभी नेताओं ने एक स्वर में प्रशासन को चेताया है कि निर्दोष मुस्लिम और ईसाई नौजवानों, पादरियों और उलेमाओं को शक और झूठे आरोपों के आधार पर जेलों में बंद रखना बंद किया जाए, अन्यथा न्याय की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरकर जेल भरो आंदोलन शुरू किया जाएगा।

