सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों की तानाशाही और आर्थिक शोषण के खिलाफ जिला प्रशासन को खुली चुनौती
बंधुआ मजदूरी' के जाल में फंसे ग्रामीण बैंकिंग की रीढ़
Junaid Khan - शहडोल। जिले में वित्तीय समावेशन की जमीनी हकीकत को संभालने वाले बैंक मित्रों (कियोस्क संचालकों) का शोषण अब बर्दाश्त से बाहर हो चुका है। मध्य प्रदेश बैंक मित्र संगठन (जिला इकाई- शहडोल) के बैनर तले सैकड़ों आक्रोशित बैंक मित्रों ने जिला मुख्यालय में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन कर कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा, जिससे पूरे प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया है। पूर्व में अखबारों में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाए जाने के बाद अब इस जन-आंदोलन पर बड़ा असर देखने को मिल रहा है। बैंक मित्रों ने सीधे तौर पर सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों को आड़े हाथों लेते हुए आरोप लगाया है कि ये कंपनियां खुलेआम श्रम कानूनों की धज्जियां उड़ा रही हैं और उनके साथ 'बंधुआ मजदूरों' जैसा अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है। सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक लगातार 12-12 घंटे काम कराने के बावजूद इन डिजिटल योद्धाओं को न तो श्रम अधिकारों का लाभ मिल रहा है और न ही कोई सम्मानजनक कार्य परिवेश। मामूली सी असहमति या हक की बात करने पर सीधे आईडी बंद करने और नौकरी से बेदखल करने की तानाशाही धमकियां दी जा रही हैं, जिसने प्रशासन की मूक सहमति पर भी गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
केंद्रीय निर्देशों की सरेआम धज्जियां, मिस-सेलिंग और जबरन वसूली का खेल बिचौलियों की चांदी
हैरानी की बात यह है कि देश की केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा बैंकों को सख्त हिदायत दी गई थी कि ग्राहकों के साथ किसी भी प्रकार की मिस-सेलिंग (गलत तरीके से उत्पाद बेचना) न की जाए। इसके बावजूद, ये निजी सर्विस प्रोवाइडर कंपनियां बैंक मित्रों पर ग्राहकों का जबरन बीमा करने और अनावश्यक खाते खोलने का अनैतिक व मानसिक दबाव बना रही हैं। इतना ही नहीं, नियुक्ति के नाम पर बेरोजगारों से अवैध वसूली का एक बड़ा सिंडिकेट सक्रिय है, जिसकी कोई रसीद या रिकॉर्ड तक नहीं दिया जाता। भ्रष्टाचार का आलम यह है कि बैंक मित्रों को मिलने वाले खून-पसीने के कमीशन का भुगतान सीधे उनके खातों में करने के बजाय, इन बिचौलिया कंपनियों के माध्यम से घुमाकर किया जा रहा है, जिससे पूरी व्यवस्था में पारदर्शिता मटियामेट हो चुकी है। सालों-साल ग्रामीण अंचलों में बैंकिंग सेवाएं देने वाले इन कर्मियों को आज तक पेंशन, ग्रेच्युटी और स्वास्थ्य बीमा जैसी बुनियादी सामाजिक सुरक्षा तक नसीब नहीं हुई है।
प्रशासनिक मौन पर उठे सवाल,कब जागेगा श्रम विभाग और जिला प्रशासन?
यह जन-उबाल सिर्फ कंपनियों की मनमानी के खिलाफ नहीं, बल्कि जिला प्रशासन और श्रम विभाग की कुंभकर्णी नींद के खिलाफ भी एक सीधी चुनौती है। आखिर नाक के नीचे चल रहे इस संगठित आर्थिक शोषण और अवैध वसूली पर अब तक कोई दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई? बैंक मित्रों ने दोटूक चेतावनी दी है कि यदि उनकी जायज मांगों जैसे कि उचित मानदेय का निर्धारण, सेवा सुरक्षा की गारंटी, कमीशन का सीधा भुगतान और बिचौलिया कंपनियों की तानाशाही पर तत्काल लगाम को पूरा नहीं किया गया, तो यह आंदोलन उग्र रूप अख्तियार करेगा। अब देखना यह है कि शहडोल जिला प्रशासन इस गंभीर वित्तीय और श्रम घोटाले पर क्या कड़ा रुख अपनाता है, या फिर बिचौलियों की इस लूट को ऐसे ही खुली छूट मिलती रहेगी।

