07 महीने से खाली पेट उप स्वास्थ्य केंद्रों की पहरेदारी कर रहे 260 मल्टी स्किल्ड कर्मचारी, अब आर-पार की जंग
Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश शासन के स्वास्थ्य संचालनालय के जनहितैषी निर्देशों को ताक पर रखकर जिला स्वास्थ्य महकमे में एक बड़े आर्थिक शोषण और प्रशासनिक भ्रष्टाचार का खेल धड़ल्ले से जारी है। जिला चिकित्सालय से लेकर सुदूर ग्रामीण अंचलों के उप स्वास्थ्य केंद्रों में अपनी रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले 260 मल्टी स्किल्ड ग्रुप डी कर्मचारी बीते 7 महीनों से अपने जायज वेतन के लिए तरस रहे हैं। हमारे समाचार पत्र द्वारा इस अमानवीय कृत्य और प्रशासनिक विफलता को प्रमुखता से उजागर किए जाने के बाद अब पूरे महकमे में हड़कंप मच गया है। नवंबर 2025 से निरंतर, बिना थमे अपनी सेवाएं दे रहे इन कोरोना-योद्धाओं और धरातल के श्रमवीरों को पिछले सात महीनों से फूटी कौड़ी का भुगतान नहीं किया गया है, जिसके चलते इन सभी 260 परिवारों के सामने आज भुखमरी और भीषण आर्थिक संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है। तंत्र की इस घोर संवेदनहीनता के खिलाफ आक्रोशित होकर अब इन शोषित कर्मचारियों ने 1 जून से उग्र आंदोलन और अनिश्चितकालीन प्रदर्शन का बिगुल फूंक दिया है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की होगी।
इस पूरे मामले की तह में जाएं तो यह सीधे तौर पर शासकीय धन के बंदरबांट और निविदा घोटाले की ओर इशारा करता है। सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय द्वारा ऑनलाइन निविदा (Online Tender) के माध्यम से जिस रसूखदार आउटसोर्स एजेंसी का चयन किया गया था, उसने नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाई हैं। नवंबर 2025 से लेकर मई 2026 तक के लंबे अंतराल के बाद भी इन कर्मचारियों के खातों में वेतन न पहुंचना यह साबित करता है कि विभागीय अफसरों और आउटसोर्सिंग कंपनी की मिलीभगत से करोड़ों रुपये के फंड को दबाकर रखा गया है या उसका दुरुपयोग किया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि जब सरकार द्वारा इन पदों के लिए बजट जारी किया जाता है, तो फिर वह राशि इन गरीब और जरूरतमंद कर्मचारियों तक क्यों नहीं पहुंचती? इस गंभीर घालमेल ने अब पूरी ऑनलाइन निविदा प्रणाली और जिम्मेदार अधिकारियों की नीयत पर सीधे तौर पर 'चुनौती' खड़ी कर दी है।
सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि ये ग्रुप डी वर्कर जिन उप स्वास्थ्य केंद्रों में तैनात हैं, वहां न तो बुनियादी तौर पर बिजली की सुचारू व्यवस्था है और न ही पर्याप्त चिकित्सकों की उपलब्धता। इन अत्यंत विपरीत और दयनीय परिस्थितियों में भी ये कर्मचारी सुबह 9 बजे से लेकर शाम 4 बजे तक न केवल स्वास्थ्य केंद्रों की सुरक्षा और निगरानी कर रहे हैं, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के लिए अपनी जान झोंक रहे हैं। इसके बावजूद, स्वास्थ्य विभाग की तानाशाही और ठेकेदार की मनमानी के कारण इन्हें इनके बुनियादी पारिश्रमिक से पूरी तरह वंचित रखा गया है। शोषित कर्मचारियों ने प्रशासन को दोटूक शब्दों में आखिरी अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी है कि यदि 31 मई तक उनके पूरे बकाए वेतन का एक-एक रुपया उनके खातों में ट्रांसफर नहीं किया गया, तो वे अपने औजार छोड़ मैदान में उतरेंगे। यदि जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था चरमराती है, तो इसका सीधा जिम्मेदार स्वास्थ्य संचालनालय और भ्रष्ट ठेका पद्धति को संरक्षण देने वाले हुक्मरान होंगे।
