पनपथा और मानपुर रेंज के तीन रेंजरों सहित पांच वनकर्मियों पर जानलेवा हमला, महिला रेंजर को बनाया बंधक; इंदवार थाने में नामजद FIR दर्ज, पर असली सवाल जस का तस आखिर कब थमेगा मानव-वन्यजीव द्वंद्व का यह खूनी खेल?
Junaid Khan - शहडोल। इंदवार वन परिक्षेत्रों में लगातार बढ़ते वन्यजीवों के दखल और प्रशासनिक लापरवाही का एक और भयावह व झकझोर देने वाला चेहरा सामने आया है। पनपथा परिक्षेत्र के ग्राम खेरवा टोला में बाघ के हमले से एक स्थानीय महिला की दर्दनाक मौत के बाद उपजा जन-आक्रोश अब क्षेत्र की कानून व्यवस्था के लिए खुली चुनौती बन चुका है। घटना से उद्वेलित और आक्रोशित ग्रामीणों ने मौके पर पहुंचे शासकीय अमले को अपनी विफलता का जिम्मेदार मानते हुए उन पर लाठी-डंडों से हिंसक हमला बोल दिया। इस अप्रत्याशित हमले में पनपथा रेंजर प्रतीक श्रीवास्तव, मानपुर रेंजर मुकेश अहिरवार, वनरक्षक प्रशांत मिश्रा, वनरक्षक पंकज चंदेली सहित शासकीय वाहन चालक जितेंद्र द्विवेदी गंभीर रूप से घायल हो गए। इतना ही नहीं, हिंसक भीड़ ने मर्यादाओं को ताक पर रखते हुए पतौर रेंजर अंजू वर्मा को न केवल बंधक बनाया, बल्कि उनके साथ भी बर्बरतापूर्वक मारपीट की। इस खूनी झड़प ने यह साफ कर दिया है कि बफर और कोर जोन के सीमावर्ती गांवों में प्रशासनिक पकड़ पूरी तरह ढीली हो चुकी है और ग्रामीणों का तंत्र पर से विश्वास उठ चुका है, जो कि सीधे तौर पर स्थानीय प्रशासन और वन मुख्यालय के लिए एक गंभीर चेतावनी है। पार्क प्रबंधन की ओर से तत्परता दिखाते हुए इंदवार थाने में 7 से अधिक नामजद और कई अज्ञात उपद्रवियों के खिलाफ गंभीर धाराओं के तहत शासकीय कार्य में बाधा, जानलेवा हमला और शासकीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का मुकदमा (FIR) दर्ज करा दिया गया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि प्रारंभिक पूछताछ और वायरल वीडियो के आधार पर आरोपियों की संख्या में भारी बढ़ोतरी होना तय है। लेकिन इस कानूनी कार्रवाई के समानांतर सबसे बड़ा प्रशासनिक प्रश्न यह खड़ा होता है कि जब रविवार को बाघ के हमले में एक महिला की मौत हुई और परिवार के तीन अन्य सदस्य लहूलुहान होकर जिंदगी की जंग लड़ रहे थे, तब वन विभाग की 'क्विक रिस्पॉन्स टीम' (QRT) और स्थानीय खुफिया तंत्र पहले ही सतर्क क्यों नहीं हुआ? क्या जिम्मेदार अधिकारियों को इस बात का भान नहीं था कि अपनों को खोने का गम और खौफ ग्रामीणों को हिंसक बना सकता है? वन विभाग की इस ढुलमुल नीति, अकर्मण्यता और सुरक्षात्मक चूक के कारण ही आज तीन-तीन रेंजरों को ऑन-ड्यूटी पिटना पड़ा और एक महिला अधिकारी को बंधक जैसी अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा।
खोखले साबित हो रहे वन्यजीव सुरक्षा के दावे,जिम्मेदार कौन?
एक तरफ जहां सरकार बाघों के संरक्षण और बफर जोन के विकास के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही है, वहीं दूसरी तरफ मैदानी हकीकत यह है कि न तो जंगल के भीतर वन्यजीव सुरक्षित हैं और न ही जंगलों के किनारे बसे इंसानों की जान की कोई कीमत है। ग्रामीणों का यह हिंसक प्रतिघात सिर्फ एक दुर्घटना का परिणाम नहीं है, बल्कि यह सालों से वन विभाग की तानाशाही, मुआवजा वितरण में लेती लतीफी और गांवों की सुरक्षा को नजरअंदाज करने के खिलाफ पनपा संचित लावा है। कानून हाथ में लेने वाले आरोपियों पर कार्रवाई जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी उन लापरवाह नीति-निर्माताओं पर कार्रवाई भी है जो एयर-कंडीशनर कमरों में बैठकर नीतियां बनाते हैं और मैदानी स्टाफ को जनता के कोपभाजन का शिकार होने के लिए अकेला छोड़ देते हैं।
इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका भी अब जांच के दायरे में है। इंदवार पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर मामले को विवेचना में तो ले लिया है, लेकिन क्षेत्र में तनाव अभी भी चरम पर है। सूत्रों की मानें तो पुलिस की ताबड़तोड़ दबिश के डर से कई गांवों में सन्नाटा पसरा हुआ है और पुरुष सदस्य घर छोड़कर भाग रहे हैं, जिससे ग्रामीण अंचलों में असंतोष और गहरा सकता है। वरिष्ठ संपादकीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह घटना सीधे तौर पर मध्य प्रदेश के वन मुख्यालय और शहडोल-उमरिया के प्रशासनिक तालमेल को खुली चुनौती देती है। जब तक संवेदनशील क्षेत्रों में वन विभाग और जनता के बीच 'कम्यूनिटी पुलिसिंग' और भरोसे का रिश्ता कायम नहीं होगा, तब तक न तो कानून का राज स्थापित हो पाएगा और न ही शासकीय अमला सुरक्षित रह सकेगा। अब देखना यह है कि इस गंभीर विफलता के बाद उच्च अधिकारी केवल एफआईआर की फाइलों में सिमट कर रह जाते हैं या मैदानी स्तर पर कोई बड़ा सुधारात्मक बदलाव लाते हैं।
