फाइलों से बाहर आ रहे सच ने उड़ाई प्रशासनिक सूरमाओं की नींद
Junaid Khan - शहडोल। नगर पालिका परिषद के भीतर विकास कार्यों के नाम पर चल रहे बंद कमरों के खेल और प्रशासनिक सांठगांठ की परतें अब सरेआम उघड़ने लगी हैं। हमारे समाचार पत्र द्वारा लगातार जनहित के मुद्दों और नगर पालिका के भीतर चल रही विसंगतियों को प्रखरता से प्रकाशित किए जाने का ही यह जबरदस्त असर है कि अब जिम्मेदार अपनी खाल बचाने के लिए एक-दूसरे के खिलाफ थानों के चक्कर काटने को मजबूर हो गए हैं। ताजा और बेहद सनसनीखेज मामला शहडोल शहर के रसूखदार ठेकेदार सुरेंद्र सिंह का सामने आया है, जिन्होंने किसी और पर नहीं, बल्कि सीधे मुख्य नगरपालिका अधिकारी (सीएमओ) आशा जितेंद्र भंडारी के खिलाफ ही कोतवाली थाने में मोर्चा खोलते हुए लिखित शिकायत दर्ज करा दी है। ठेकेदार सुरेंद्र सिंह का सीधा आरोप है कि सीएमओ द्वारा सोची-समझी रणनीति के तहत, जानबूझकर असत्य, मनगढ़ंत और तथ्यों से पूरी तरह विपरीत जानकारियां अन्य लोगों और माध्यमों को परोसी जा रही हैं। इस शिकायती पत्र ने सीधे तौर पर नगर पालिका की गोपनीयता और उसकी प्रशासनिक साख को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जिससे पूरे प्रशासनिक अमले में हड़कंप व्याप्त है। कोतवाली पुलिस को सौंपे गए अपने तीखे आवेदन में ठेकेदार सुरेंद्र सिंह ने प्रशासनिक मर्यादाओं को चुनौती देते हुए कहा है कि वे वर्षों से विभिन्न शासकीय विभागों में पूरी तरह से विधिसम्मत और पारदर्शी कार्य कर रहे हैं। लेकिन सीएमओ आशा जितेंद्र भंडारी द्वारा कार्यालय के अत्यंत गोपनीय और संवेदनशील दस्तावेजों को अवैधानिक रूप से, गलत तथ्यों का तड़का लगाकर सार्वजनिक किया जा रहा है। ठेकेदार का दावा है कि इस दुर्भावनापूर्ण कृत्य के कारण उनके खिलाफ षड्यंत्रकारी सामग्री बाहर आ रही है, जिससे समाज में उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा,व्यक्तिगत सम्मान और व्यावसायिक विश्वसनीयता को अपूरणीय क्षति पहुंची है। उन्होंने दो टूक शब्दों में प्रशासन को घेरते हुए लिखा है कि यदि किसी विषय में कोई प्रशासनिक या विभागीय जांच पहले से विचाराधीन है, तो उसकी आधिकारिक और अंतिम स्थिति से अलग हटकर आधी-अधूरी व भ्रामक जानकारियां देकर जनमानस में नकारात्मक धारणा बनाना सरासर अनुचित और गैर-कानूनी है। इस अपुष्ट सूचना के कारण शहर के गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं गर्म हैं, जिसने ठेकेदार की छवि को पूरी तरह धूमिल कर दिया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए आवेदक ने सीधे पुलिस अधीक्षक (SP) और कोतवाली थाना प्रभारी से इस पूरे सिंडिकेट और सीएमओ की कार्यप्रणाली की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि जांच के दौरान यह प्रमाणित होता है कि जानबूझकर भ्रामक जानकारी देकर छवि खराब करने का कुत्सित प्रयास किया गया है, तो सीएमओ के खिलाफ तत्काल प्रभाव से प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर दंडात्मक कार्रवाई की जाए। इधर, मामले की कमान संभालते हुए कोतवाली टीआई राघवेंद्र तिवारी ने बताया कि ठेकेदार की शिकायत प्राप्त हुई है और पूरे मामले पर वैधानिक प्रक्रिया के तहत निष्पक्ष जांच कर कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। हालांकि, इस पूरे सियासी और प्रशासनिक घमासान पर जब हमारे खोजी ब्यूरो ने मुख्य नगरपालिका अधिकारी आशा जितेंद्र भंडारी का पक्ष जानने का प्रयास किया, तो उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई, जिससे संदेह के बादल और गहरे हो गए हैं। वरिष्ठ पत्रकारीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह केवल एक ठेकेदार और अधिकारी की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह नगर पालिका के भीतर बैठे उस तंत्र की छटपटाहट है, जिसके कारनामे अब हमारे अखबार की प्रखर पत्रकारिता के कारण बेनकाब होने लगे हैं।
लगोपनीयता भंग या पाप का घड़ा फूटा? जनता मांगे हिसाब
नगर पालिका परिषद जैसे जिम्मेदार संस्थान की मुखिया पर जब खुद उनके ही अधीन काम करने वाले ठेकेदार दस्तावेजों को अवैधानिक रूप से बाहर करने और भ्रामक दुष्प्रचार करने का आरोप लगाएं, तो समझ जाना चाहिए कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। अगर दस्तावेज सही हैं, तो सीएमओ महोदया सामने आकर अपना पक्ष रखने से क्यों बच रही हैं? और यदि दस्तावेज भ्रामक हैं, तो सरकारी दफ्तर से ऐसी फाइलें बाहर कैसे आ रही हैं? यह सीधे तौर पर उस व्यवस्था को खुली चुनौती है जो अंदरूनी तौर पर खोखली हो चुकी है। हमारे अखबार की पैनी नजर पुलिस की इस 'वैधानिक जांच' पर टिकी हुई है, और हम इसके पीछे छिपे असली चेहरों को बेनकाब करना जारी रखेंगे।
