'प्रदेश सत्ता' की खबर का बंपर असर: दिखावे के निरीक्षण से खुली सरकारी दावों की पोल, प्रशासन और शराब माफिया को खुली चुनौती
Junaid Khan - शहडोल। भ्रष्टाचार,ओवररेटिंग और ग्रामीण इलाकों में पैर पसारते अवैध शराब के सिंडिकेट के खिलाफ जब 'प्रदेश सत्ता' ने मुखर होकर आवाज उठाई, तो प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। हमारे द्वारा प्रमुखता से प्रकाशित की गई खोजी रिपोर्ट का सीधा असर आबकारी विभाग की सुस्ती पर पड़ा है। खबर छपने के बाद नींद से जागे आबकारी विभाग के मैदानी अमले ने आनन-फानन में शहडोल नगर के सोहागपुर, बस स्टैंड स्थित कंपोजिट मदिरा दुकान और बुढ़ार रोड स्थित शराब दुकान सहित अन्य केंद्रों का औचक निरीक्षण किया। कलेक्टर डॉ. केदार सिंह के सख्त निर्देशन पर हुई इस विभागीय दौड़-धूप में आबकारी निरीक्षक रजनीश त्रिपाठी सहित अन्य अधिकारी आनन-फानन में दुकानों में रेट सूची, बिक्री व्यवस्था खंगालते और ग्राहकों से औपचारिकता निभाते नजर आए। लेकिन इस दिखावे की कार्रवाई से जनता संतुष्ट नहीं है; बल्कि इसे महज एक 'आईवॉश' (आंखों में धूल झोंकने की कवायद) मान रही है।
कागजी निरीक्षण बनाम जमीनी हकीकत,एक उप-निरीक्षक के भरोसे भगवान भरोसे जिला
प्रशासनिक अमला भले ही पीठ थपथपा रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि यह निरीक्षण केवल सरकारी कागजों को दुरुस्त करने की एक नाकाम कोशिश है। जिले में आबकारी व्यवस्था का ढांचा इस कदर चरमरा चुका है कि पांचों सर्किल की 29 देशी-विदेशी शराब दुकानें, दोनों बांड और अंग्रेजी व देशी शराब के वेयरहाउसों की पूरी कमान केवल एक आबकारी उप-निरीक्षक रजनीश त्रिपाठी के कंधों पर टिके होने का दावा किया जा रहा है। जब एक ही अधिकारी के भरोसे पूरा जिला होगा, तो कार्रवाई की गंभीरता का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। ठेका बदलते ही आबकारी विभाग की इस लाचारी का पूरा फायदा शराब माफिया उठा रहे हैं। अधिकारी दुकानों पर जाकर नियम पालन की हिदायत तो दे रहे हैं, लेकिन हकीकत में एमआरपी से अधिक दाम वसूली (ओवर रेटिंग) का खेल धड़ल्ले से जारी है। ग्राहकों से आए दिन होने वाले विवाद और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो गवाही दे रहे हैं कि सेल्समैनों को ठेकेदारों की तरफ से मनमानी की खुली छूट मिली हुई है।
पैकारों का बढ़ता मायाजाल, 35 से बढ़कर 70 हुए अवैध ठिकाने,लक्ष्मी के वरदहस्त से आबकारी मौन
नयी ठेका व्यवस्था (अप्रैल 2026) लागू होते ही जिले में अवैध शराब का कारोबार कुकुरमुत्ते की तरह फैल गया है। पहले जहां मुख्यालय के आसपास लगभग 35 पैकारी ठिकाने सक्रिय थे, वहीं अब 'लक्ष्मी' के कथित वरदहस्त और विभागीय मौन के कारण यह संख्या दोगुनी होकर 70 के पार पहुंच चुकी है। विचारपुर, कल्याणपुर, पचगांव, मिठौरी, अमरहा, भमरहा, सिंहपुर, सिंदूरी, मझगवा, केलमनिया, जमुई, जमुना, गोरतरा, पोंगरी, नदना, खेतौली, नवलपुर, धुरवार, कंचनपुर, हर्री, निपानिया, बरुका, छतवई, पटासी और रोहनिया जैसे ग्रामीण अंचल आज पैकारों के गढ़ बन चुके हैं। गांव-गांव में मोटरसाइकिल और दूरदराज के इलाकों में बिना नंबर की चारपहिया गाड़ियों से अवैध शराब की खेप बेखौफ सप्लाई की जा रही है। इस संगठित नेटवर्क को देखकर साफ है कि आबकारी विभाग की निष्क्रियता केवल लापरवाही नहीं, बल्कि अपराधियों को सीधा संरक्षण है।
माफियाओं और प्रशासन को सीधी चुनौती,कब थमेगा यह बेलगाम सिंडिकेट?
यह खबर सीधे तौर पर उन सफेदपोश शराब माफियाओं और मूकदर्शक बने आबकारी विभाग को खुली चुनौती देती है जो कानून को अपनी जेब में रखकर घूम रहे हैं। बीते वर्ष की तुलना में इस वर्ष अवैध पैकारी या ओवर रेटिंग पर विभाग की कार्रवाई लगभग शून्य रही है, जो इनकी कार्यप्रणाली को पूरी तरह कटघरे में खड़ा करती है। जब तक केवल 'निरीक्षण और हिदायत' का नाटक चलता रहेगा और जमीनी स्तर पर बड़ी जब्ती या एफआईआर दर्ज नहीं होगी, तब तक इन माफियाओं के हौसले बुलंद रहेंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में शराब के इस अवैध जाल के कारण सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा है और अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है।
जनता के तीखे सवाल,अब तो जवाब देना ही होगा
'प्रदेश सत्ता' के इस खुलासे के बाद अब आम जनता सीधे प्रशासन से जवाब मांग रही है:
आखिर इस बेलगाम अवैध शराब कारोबार पर आबकारी विभाग अंतिम प्रहार कब करेगा?
काउंटर पर सरेआम एमआरपी से ज्यादा पैसे ऐंठने वाले सेल्समैनों और ठेकेदारों को जेल की सलाखों के पीछे क्यों नहीं भेजा जा रहा?
सबसे बड़ा सवाल... क्या शहडोल का आबकारी अमला सिर्फ कागजी कोरम पूरा करने के लिए रह गया है, या फिर इस अवैध कमाई में ऊपर से नीचे तक सबकी हिस्सेदारी तय है?
प्रशासन को अब इन सवालों का जवाब अपनी कार्यशैली से देना होगा, वरना जनता का यह आक्रोश आने वाले दिनों में उग्र आंदोलन का रूप ले सकता है।
