अधिग्रहित भूमि का मुआवजा डकार कर बैठे जिम्मेदार, ब्यौहारी में आक्रोशित ग्रामीणों ने 1 घंटे तक रोके रखी सांसद की गाड़ियां,तीखे सवालों के आगे बेबस नजर आए जनप्रतिनिधि।
Junaid Khan - शहडोल। ब्यौहारी सरकारी सिस्टम की कछुआ चाल और तानाशाही का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा कि तीन साल पहले बनकर तैयार हो चुका एक करोड़ का पुल आज भी आम जनता के लिए बंद पड़ा है। पूरा पुल बनकर मुकम्मल है, लेकिन पहुंच मार्ग के लिए जिन स्थानीय किसानों की जमीनें ली गईं, उन्हें आज तक मुआवजे की एक कौड़ी नसीब नहीं हुई। प्रशासनिक ढुलमुल रवैये और भू-माफियाई गठजोड़ की इस अवैध लापरवाही के खिलाफ आखिरकार जनता का सब्र टूट गया। ब्यौहारी विधानसभा क्षेत्र के भमरहा प्रथम गांव में जब सीधी सांसद डॉ. राजेश मिश्रा का काफिला गुजरा, तो ग्रामीणों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया। लगभग एक घंटे तक सांसद की गाड़ियों के पहिए थमे रहे और जनता के तीखे सवालों के सामने पूरा अमला असहाय नजर आया।
मुआवजे की फाइल दबाए बैठे हैं अफसर,30 किसानों के हक पर डाका
यह पूरा मामला झापर नदी पर बने पुल और उसके एप्रोच रोड का है। जिला पंचायत सदस्य पुष्पेंद्र सिंह पटेल और स्थानीय विधायक शरद जुगलाल कोल की मौजूदगी में ग्रामीणों ने साफ कहा कि करीब 30 से अधिक पीड़ित किसानों के मुआवजे की राशि को अधिकारी दबाकर बैठे हैं। एक तरफ विकास का ढोल पीटा जा रहा है, तो दूसरी तरफ अन्नदाताओं की अधिग्रहित भूमि का हक मारकर उन्हें दर-दर भटकने पर मजबूर किया जा रहा है। जन चौपाल कार्यक्रम और ग्राम कोना टोला में रात्रि विश्राम के लिए जा रहे सांसद को ग्रामीणों ने जमीन पर उतरने को मजबूर किया और दोटूक चेतावनी दी कि जब तक झापर नदी पुल को आम जनता के लिए चालू नहीं किया जाता और किसानों के मुआवजे का पाई-पाई भुगतान नहीं होता, तब तक क्षेत्र में किसी भी सरकारी औपचारिकता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
कब टूटेगी कुंभकर्णी नींद? सांसद का 'आश्वासन',जनता को चाहिए 'ऐक्शन'
इस भारी विरोध और आक्रोश को भांपते हुए सांसद डॉ. राजेश मिश्रा ने मौके पर ग्रामीणों को आश्वस्त तो किया कि वे जल्द ही संबंधित उच्चाधिकारियों से बात कर मुआवजे की राशि दिलाएंगे और पुल चालू करवाएंगे, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि प्रशासन अब तक किसकी शह पर सोया हुआ था? क्या बिना जनता के सड़क पर उतरे और जनप्रतिनिधियों का घेराव किए अफसरों की फाइलें आगे नहीं खिसकतीं? किसानों की जमीनों पर कुंडली मारकर बैठे और इस पूरी प्रक्रिया में अड़ंगा लगाने वाले सफेदपोशों और लापरवाह अफसरों को अब जवाब देना होगा। अगर यह पुल जल्द नहीं खुला, तो यह चिंगारी एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकती है।
