बड़ा भू-घोटाला 40 साल पुराने सरकारी बांध और नहर पर भू-माफियाओं का 'सर्जिकल स्ट्राइक', पिलर खोदकर बना रहे बाउंड्रीवॉल
Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश के शहडोल जिले से इस वक्त की सबसे सनसनीखेज और प्रशासनिक तंत्र को हिला देने वाली खबर सामने आ रही है, जहां सोहागपुर तहसील के अंतर्गत आने वाले राजस्व ग्राम बरुका में भू-माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि उन्होंने सीधे सरकार और जनता की साझी विरासत पर ही डाका डाल दिया है। मामला किसी निजी जमीन का नहीं, बल्कि वर्ष १९७७ में जल संसाधन विभाग (Water Resources Department) द्वारा निर्मित उस ऐतिहासिक बांध और नहर का है, जो पिछले लगभग ५० वर्षों से पूरे क्षेत्र के किसानों और ग्रामीणों के लिए जीवनदायिनी बनी हुई है। रसूखदार भू-माफियाओं ने इस सरकारी नहर और निर्माणाधीन बांध की भूमि पर न केवल अवैध रूप से कब्जा कर लिया है, बल्कि वहां धड़ल्ले से पिलर खोदकर बाउंड्रीवॉल का निर्माण कार्य भी शुरू कर दिया है। आश्चर्य की बात यह है कि दिन के उजाले में चल रहे इस खुले खेल पर स्थानीय अमला आंखें मूंदे बैठा है, जो सीधे तौर पर प्रशासनिक संरक्षण या फिर भारी मिलीभगत की ओर इशारा करता है। इस दुस्साहस ने स्थानीय प्रशासन की साख और मुख्यमंत्री के 'माफिया-मुक्त मध्य प्रदेश' के दावों को खुली चुनौती दे दी है।
नामजद रसूखदारों का सिंडिकेट,खसरा नंबर १७ की आड़ में खसरा नंबर १ पर कब्जा
सरकारी दस्तावेजों और ग्राम पंचायत बरुका की सरपंच पुइया बैगा द्वारा कमिश्नर, कलेक्टर, नायब तहसीलदार और जल संसाधन विभाग के कार्यपालन यंत्री को भेजी गई लिखित शिकायतों (दिनांक ०२ जून और ०४ जून २०२६) से जो सच निकलकर सामने आया है, वह बेहद चौंकाने वाला है। शिकायत के मुताबिक, शहडोल के ही रहने वाले कुछ रसूखदार भूमि स्वाम जिनमें अजय कुमार (पिता गुरुमुख दास), मनोज (पिता गुरुमुख दास), बलराम गुप्ता (पिता नौमीदीन गुप्ता) और शांति स्वरूप (पिता दयालदास जगवानी) शामिल हैं—इन सभी के द्वारा अपनी भूमि खसरा नंबर १७ की आड़ में, उससे लगी हुई शासकीय राजस्व भूमि आराजी खसरा नंबर १ पर अवैध रूप से कब्जा किया जा रहा है। इसी खसरा नंबर १ पर जल संसाधन विभाग की वह नहर स्थित है जिसका उपयोग सदियों से पूरा गांव करता आ रहा है। इन रसूखदारों ने सरकारी कायदे-कानूनों को ठेंगे पर रखकर नहर की चौहद्दी के भीतर पिलर गाड़ दिए हैं। यह सीधे तौर पर एक सुनियोजित लैंड ग्रैबिंग (भूमि हड़पने) का मामला है, जिसमें सरकारी संपत्ति को निजी जागीर बनाने की पूरी तैयारी कर ली गई है।
सरपंच की कड़क चुनौती,अंधा कानून' या 'लाचार प्रशासन'? जनता सड़क पर उतरने को मजबूर
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रशासनिक तमाचा यह है कि ग्राम पंचायत बरुका की सजग सरपंच पुइया बैगा ने लगातार २ जून से लेकर ४ जून २०२६ के बीच जिला प्रशासन के हर बड़े दरवाजे पर दस्तक दी है। नायब तहसीलदार सोहागपुर से लेकर, जल संसाधन संभाग क्रमांक-२ के कार्यपालन यंत्री, जिला कलेक्टर और सीधे शहडोल संभाग के कमिश्नर तक को लिखित पत्र सौंपकर इस अवैध निर्माण कार्य को त्वरित प्रभाव से रोकने और दोषियों के खिलाफ विधि सम्मत दंडात्मक कार्रवाई की मांग की गई है। अधिकारियों के टेबल पर शिकायत के कागजात पहुंच चुके हैं और उन पर शासकीय सील-सिक्के भी दर्ज हो चुके हैं, लेकिन धरातल पर अब तक भू-माफियाओं के खिलाफ कोई ठोस 'बुलडोजर एक्शन' या काम रोकने की मुनादी नहीं दिखाई दी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या शहडोल का प्रशासनिक अमला इन रसूखदार भू-माफियाओं के सामने नतमस्तक हो चुका है? या फिर किसी बड़े आदेश का इंतजार किया जा रहा है? यदि समय रहते इस ५० साल पुरानी सरकारी नहर को भू-माफियाओं के चंगुल से मुक्त नहीं कराया गया, तो ग्रामीणों का आक्रोश फूट सकता है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी।
आखिर किसके इशारे पर मौन है जल संसाधन विभाग?
जिस नहर और बांध को बचाने के लिए पूरी पंचायत लड़ाई लड़ रही है, उसका असली मालिक यानी 'जल संसाधन विभाग' इस पूरे मामले में मूकदर्शक बना हुआ है। ४ जून २०२६ को विभाग के कार्यपालन यंत्री (EE) कार्यालय में शिकायत दर्ज होने के बाद भी विभाग की टीम का मौके पर न पहुंचना कई गंभीर संदेहों को जन्म देता है। क्या सरकारी इंजीनियरों को अपनी ५० साल पुरानी संपत्ति के लुट जाने का कोई गम नहीं है, या फिर इस सिंडिकेट के तार अंदर तक जुड़े हैं? यह जांच का विषय है।

