सीधे अदालत को चुनौती,ठेंगे पर कानून

एस. एन. शुक्ला विश्वविद्यालय में तानाशाही की पराकाष्ठा: कोर्ट के स्थगन आदेश की धज्जियां 


Junaid Khan - शहडोल। स्थानीय पंडित शंभूनाथ शुक्ल विश्वविद्यालय प्रबंधन इन दिनों अपनी चरम मनमानी, निरंकुशता और तुगलकी फरमानों को लेकर एक बार फिर गंभीर विवादों के घेरे में आ गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने शिक्षा के इस पवित्र मंदिर को राजनीति और मलाई बांटने का अखाड़ा बनाते हुए स्थापित नियमों को पूरी तरह ताक पर रख दिया है। बिना किसी पूर्व सूचना, कारण बताओ नोटिस या लिखित आदेश के, अचानक 25 से अधिक अनुभवी अतिथि विद्वानों और विजिटिंग फैकल्टी को तत्काल प्रभाव से नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। प्रबंधन का यह एकतरफा और अमानवीय फैसला केवल प्रशासनिक अक्षमता नहीं, बल्कि सीधे तौर पर कानून और न्यायपालिका की सर्वोच्चता को खुली चुनौती है। इस पूरी कार्रवाई में सबसे चौंकाने वाला और गंभीर पहलू यह है कि माननीय न्यायालय से विधिवत स्थगन आदेश (स्टे ऑर्डर) लेकर नियमित सेवाएं दे रहे शिक्षकों के अदालती आदेश को भी रद्दी का टुकड़ा समझकर कचरे के डिब्बे में फेंक दिया गया। यह सीधे-सीधे न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) का संगीन मामला है, जिसने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन का यह आत्मघाती और गैर-जिम्मेदाराना फैसला ठीक उस नाजुक वक्त पर आया है, जब विश्वविद्यालय में स्नातक (UG) और स्नातकोत्तर (PG) स्तर की मुख्य वार्षिक एवं सेमेस्टर परीक्षाएं प्रारंभ हो रही हैं। नए और पुराने दोनों परिसरों (कैंपस) को मिलाकर 3000 से अधिक परीक्षार्थी इन महत्वपूर्ण परीक्षाओं में शामिल हो रहे हैं। ऐसे परीक्षा काल में, जब छात्रों को शिक्षकों के मार्गदर्शन और कॉपियों के त्वरित मूल्यांकन की सबसे ज्यादा जरूरत है, एक साथ 25 से अधिक रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले अनुभवी शिक्षकों को हटाकर पूरे विश्वविद्यालय की अकादमिक व्यवस्था को पूरी तरह से राम भरोसे छोड़ दिया गया है। बची हुई परीक्षाओं के संचालन, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता और उत्तरपुस्तिकाओं के मूल्यांकन का अतिरिक्त और असहनीय बोझ अब मुट्ठी भर नियमित कर्मचारियों और शेष बचे शिक्षकों पर डाल दिया गया है। साफ है कि इस भयानक अव्यवस्था और प्रशासनिक शून्यता का सीधा और घातक असर परीक्षाओं की शुचिता, गोपनीयता और अंततः हजारों मासूम छात्रों के परीक्षा परिणामों व उनके सुनहरे भविष्य पर पड़ना तय है।

चहेतों को उपकृत करने का खेल,पिछले दरवाजे से 'पिक एंड चूज' की मलाई 

पीड़ित शिक्षकों ने विश्वविद्यालय प्रबंधन पर बेहद गंभीर, सनसनीखेज और संगीन आरोप लगाए हैं। शिक्षकों का स्पष्ट कहना है कि इस छंटनी की आड़ में भारी भाई-भतीजावाद, पक्षपात और 'पिक एंड चूज' (चुन-चुन कर निशाना बनाने) की भ्रष्ट नीति अपनाई गई है। कुछ खास रसूखदार, अयोग्य और चहेते अतिथि विद्वानों को पिछले दरवाजे से पिछले सत्र की तरह सेवा में बनाए रखने की पूरी स्क्रिप्ट तैयार कर ली गई है, जबकि पूरी निष्ठा, कर्मठता और योग्यता से बरसों से अपनी सेवाएं दे रहे योग्य शिक्षकों को बिना किसी वैध कारण के बाहर कर दिया गया। किसी बड़ी कॉरपोरेट कंपनी की तर्ज पर विश्वविद्यालय जैसे सार्वजनिक संस्थान में मौखिक और जुबानी फरमान सुनाकर काम पर आने से मना करना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। पीड़ित शिक्षकों ने मांग की है कि यदि प्रबंधन का यह फैसला नियमानुसार है, तो वह यह मौखिक नौटंकी बंद करे और लिखित रूप में सेवा समाप्ति का आदेश जारी कर उसका ठोस विधिक कारण स्पष्ट करे। दूसरी ओर, चौतरफा घिरे विश्वविद्यालय प्रबंधन द्वारा अपनी नाकामियों और इस अवैध कृत्य को छुपाने के लिए घिसा-पिटा और लचर तर्क दिया जा रहा है कि शैक्षणिक सत्र समाप्त होने के साथ ही अतिथि विद्वानों का कार्यकाल स्वतः पूरा हो गया है। लेकिन प्रबंधन इस बुनियादी सवाल का जवाब देने से पूरी तरह बच रहा है कि जब कॉपियों को जांचने और परीक्षा संपन्न कराने का मुख्य और सबसे महत्वपूर्ण काम अभी बाकी है, तो कक्षाएं खत्म होने का बहाना कितना जायज है? बिना किसी लिखित विधिक आदेश के, कोर्ट के स्टे वाले कर्मचारियों को हटाना सीधे तौर पर उच्च प्रशासनिक अधिकारियों और राजनेताओं के संरक्षण को दर्शाता है। इस तानाशाहीपूर्ण और पूरी तरह से अवैध निर्णय के खिलाफ अब छात्रों और विभिन्न छात्र संगठनों में भारी आक्रोश सुलग रहा है। यदि इस तुगलकी फरमान को तुरंत वापस लेकर उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच नहीं बैठाई गई, तो आने वाले दिनों में विश्वविद्यालय परिसर में एक उग्र और ऐतिहासिक आंदोलन छिड़ना तय है, जिसकी संपूर्ण कानून-व्यवस्था संबंधी जिम्मेदारी विश्वविद्यालय प्रशासन और मूकदर्शक बने जिला प्रशासन की होगी।

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